Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

वीर्यरक्षा के प्रयोग 1

वीर्यरक्षा के प्रयोग

मंत्र-प्रयोग

‘ॐ अर्यमायै नमः’ - भगवान अर्यमा का यह मंत्र श्रद्धा से जपनेवाला विकारी वातावरण व विकारी लोगों के बीच से भी बचकर निकल सकता है । श्रद्धा से जपने पर बहुत लाभ होता है यह कइयों का अनुभव है । स्त्री-पुरुष जिनको भी कामविकार गिराता हो उन्हें इस महामंत्र का आदरपूर्वक जप करना चाहिए । रात्रि को सोने से पूर्व २१ बार इस मंत्र का जप करने से तथा तकिये पर अपनी माँ का नाम लिखने से (स्याही-पेन से नहीं, केवल उँगली से) व्यक्ति बुरे एवं विकारी सपनों से बच जाता है ।

वीर्यरक्षक चूर्ण

बहुत कम खर्च में आप यह चूर्ण बना सकते हो । कुछ सूखे आँवलों से बीज अलग करके उन आँवलों को कूटकर चूर्ण बना लो । यह संत श्री आशारामजी आश्रमों व आश्रम की समितियों में तैयार मिलता है । आँवला चूर्ण व पिसी मिश्री का समभाग मिश्रण बनाकर उसमें २० प्रतिशत हल्दी मिला दो । यह चूर्ण उनके लिए भी हितकर है जिन्हें स्वप्नदोष नहीं होता हो ।

रोज रात्रि को सोने से आधा घंटा पूर्व पानी के साथ एक चम्मच यह चूर्ण ले लिया करो । यह चूर्ण वीर्य को गाढ़ा करता है, कब्ज दूर करता है, वात-पित्त-कफ के दोष मिटाता है और संयम को मजबूत करता है ।

सावधानी : इसके सेवन से सवा दो घंटे पहले या बाद में दूध न पियें ।

गोंद का प्रयोग

६ ग्राम खैर का गोंद रात को पानी में भिगो दो व सुबह खाली पेट लो । प्रयोग के दौरान भूख कम लगती हो तो दोपहर को भोजन के पूर्व अदरक व नींबू का रस मिलाकर लो ।

तुलसी : एक अद्भुत औषधि

फ्रेंच डॉक्टर विक्टर रेसीन ने कहा है : ‘‘तुलसी एक अद्भुत औषधि (थेपवशी र्वीीस) है । इस पर किये गये प्रयोगों ने यह सिद्ध कर दिया है कि रक्तचाप और पाचनतंत्र के नियमन में तथा मानसिक रोगों में तुलसी अत्यंत लाभकारी है । इससे रक्तकणों की वृद्धि होती हैŸ। मलेरिया तथा अन्य प्रकार के बुखारों में तुलसी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है ।’’

तुलसी रोगों को तो दूर करती ही है, इसके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य की रक्षा करने एवं यादशक्ति बढ़ाने में भी अनुपम सहायता करती है । तुलसीदल एक उत्कृष्ट रसायन है । यह त्रिदोषनाशक है । रक्तविकार, वायु, खाँसी, कृमि आदि की निवारक है तथा हृदय के लिए बहुत हितकारी है ।

तुलसी के बीज कूटकर रख लें । एक चुटकी (आधा व चौथाई ग्राम के बीच) रात को भिगो दें । सुबह खाली पेट पी लें । वात, पित्त, कफ - इन तीनों के असंतुलन से ही सारी बीमारियाँ होती हैं और तुलसी के बीज त्रिदोषशामक हैं । अतः त्रिदोषजनित तथा कैंसर आदि बीमारियाँ आपके पास नहीं फटकेंगी । इस प्रयोग से भूख अच्छी लगेगी और बहुत सारे स्वास्थ्य-लाभ होंगे । इस प्रयोग से वीर्यरक्षा का भी सीधा संबंध है । जितने दिन अनुकूल लगे उतने दिन यह प्रयोग कर सकते हैं ।

पादपश्चिमोत्तानासन

लाभ : इससे नाड़ियों की विशेष शुद्धि होकर हमारी कार्यक्षमता बढ़ती है व बीमारियाँ दूर होती हैं । बदहजमी, कब्ज जैसे पेट के सभी रोग, सर्दी-जुकाम, कफ गिरना, कमरदर्द, हिचकी, सफेद कोढ़, पेशाब की बीमारियाँ, स्वप्नदोष, वीर्य-विकार, अपेंडिसाइटिस, सायटिका, नलों की सूजन, पीलिया, अनिद्रा, दमा, खट्टी डकारें, ज्ञानतंतुओं की कमजोरी, गर्भाशय के रोग, मासिकधर्म की अनियमितता व अन्य तकलीफें, नपुंसकता, रक्तविकार, qठगनापन व अन्य कई प्रकार की बीमारियाँ यह आसन करने से दूर होती हैं ।

इस आसन से शरीर का कद लम्बा होता है । यदि शरीर में मोटापन है तो वह दूर होता है और यदि दुबलापन है तो वह दूर होकर शरीर सुडौल, तंदुरुस्त अवस्था में आ जाता हैŸ। ब्रह्मचर्य पालनेवालों के लिए यह आसन भगवान शिव का प्रसाद है । इसका प्रचार पहले शिवजी ने और बाद में जोगी गोरखनाथ ने किया था ।

विधि : जमीन पर आसन बिछाकर दोनों पैर सीधे करके बैठ जाओ । फिर दोनों हाथों से पैरों के अँगूठे पकड़कर झुकते हुए ललाट को दोनों घुटनों से मिलाने का प्रयास करो । घुटने जमीन पर सीधे रहें । प्रारम्भ में घुटने जमीन पर न टिकें तो कोई हर्ज नहीं । सतत अभ्यास से यह आसन सिद्ध हो जायेगा । यह आसन करने के १५ मिनट बाद एक-दो कच्ची भिंडी खानी चाहिए । सेवफल का सेवन भी फायदा करता है ।

प्रारम्भ में यह आसन आधा मिनट से शुरू करके प्रतिदिन थोड़ा समय बढ़ाते हुए १५ मिनट तक कर सकते हैं । पहले २-३ दिन तकलीफ होती है, फिर सरल हो जाता है ।

(आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश’ से)