Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

आराधना, उपवास और विश्रांति का सुवर्णकाल

(नवरात्रि: 17 से 25 अक्टूबर)

श्रीमद् देवी भागवतके तीसरे स्कंध में महर्षि वेदव्यासजी जनमेजय को नवरात्रों का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं :

6-6 मास में नवरात्रि आती है । शारदीय नवरात्र रावण-वध की तिथि के पहले आते हैं और दूसरे नवरात्र आते हैं वसंत ऋतु में रामजी के प्राकट्य के पहले । ये दोनों ऋतुएँ बड़ी क्रूर हैं । ये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं । इन दिनों में व्यक्ति अगर नवरात्रि का व्रत और उपवास नहीं करता तो वह आगे चल के बड़ी-बड़ी बीमारियों का शिकार हो सकता है अथवा अभी भी बीमारियों में वह भुन जायेगा । अगर नवरात्रि व्रत रखता है, भगवती की आराधना करता है तो आराधना की पुण्याई व प्रसन्नता से मनोरथ भी पूरे होते हैं और शरीर में जो विजातीय द्रव्य हैं, उपवास और विश्रांति उन रोगकारक द्रव्यों को भस्म कर देती है ।

नवरात्रि के उपवास से शरीर के जीर्ण-शीर्ण रोग और रोग लानेवाले कण ये सब नष्ट हो जाते हैं, पाप दूर होते हैं, मन प्रसन्न होता है, बुद्धि का औदार्य व तितिक्षा का गुण बढ़ता है और नारकीय योनियों से छुटकारा मिलता है । 9 दिन के नवरात्रि व्रत या उपवास नहीं रख सकते तो भैया ! 6 दिन, 5 दिन, नहीं तो अंतिम 3 दिन कड़क नियम पालन करते हुए उपवास रखें तो भी 9 दिन के नवरात्रि का फल प्राप्त कर सकते हैं, ऐसा लिखा है ।