वर्तमान समय में दंत-रोगों की समस्या से युवा व वृद्ध ही नहीं, बच्चे भी ग्रस्त हैं । इसका सबसे बड़ा कारण है कि दातुन व मंजन छोड़कर लोग पेस्ट-ब्रश का उपयोग करने लगे हैं । अतः शौच के बाद नीम या बबूल की ताजी या भीगी हुई दातुन से (कभी-कभी तम्बाकूरहित आयुर्वेदिक मंजन से) दाँत अच्छी तरह साफ करने चाहिए । पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘मेरे गुरुदेव (साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज) भी बेहद (असीम) थे... नित्य नवीन रस ! नहीं तो 84 साल, 90 साल के बूढ़ों की हालत देखो ! मेरे गुरुजी कहीं से गुजरे और किसीने बोला कि ‘‘एक बूढ़ा महाराज आया है, ताँगे में बैठा है ।’’
गुरुजी बोले : ‘‘ऐ ! तेरा बाप बूढ़ा, तेरी माँ बूढ़ी, तेरा काका, तेरा दादा, तेरे गोधरा के फलाने-फलाने बूढ़े । मैं 90 साल का जवान और तेरा बाप 50 साल का बूढ़ा ! मेरे साथ दौड़ के दिखा !’’ क्या लीलाशाहजी की लीला है !
वे सदा दातुन करते थे । तो उनके दाँत 90 साल की उम्र में भी बढ़िया और हम सुधरे हुए जमाने के गुलाम बने, पेस्ट और ब्रश किया तो हमारे को तो डेंटिस्ट की गुलामी करनी पड़ी, फिर हमने पेस्ट को किनारे कर दिया । अब दातुन या मंजन करता हूँ तो दाँत सब ठीक हैं । पेस्ट और ब्रश करने से आगे चल के दाँतों की हालत खराब हो जाती है, अतः दातुन अथवा मंजन करना चाहिए । अगर ज्यादा दातुन नहीं मिल रही है तो गांधीजी के तरीके से दातुन करें । एक दिन में जितनी दातुन उपयोग होती, गांधीजी उतनी काटकर फेंक देते थे और बची हुई धो के रख लेते थे, इस प्रकार दातुन पूरी होने तक थोड़ा-थोड़ा उपयोग करते थे । दातुन ही करनी चाहिए्र और नीम की दातुन मिलती है तो सुबह-सुबह चबा के उसका थोड़ा रस ले लें । ब्रह्मचर्य पालने में और पित्त-शमन करने में नीम का रस बड़ा काम करता है ।
तो जिनको पित्त की तकलीफ है, गर्मी है या चमड़ी की तकलीफें या रक्तस्राव बार-बार होता है, वे नीम की दातुन करके उसका रस लें तो नकसीर फूटना या मस्से या अन्य अंग से रक्त बहना कम हो जायेगा ।
मसूड़ों की सुरक्षा और दाँतों को मजबूत बनाने में नमक और सरसों के तेल का प्रयोग उपयोगी है । मेरे गुरुजी महीने में एक बार नमक और सरसों के तेल से दाँतों को जरा मल देते । जल्दी दाँत खराब नहीं हों इसलिए मैं भी रात को उँगली (सबसे बड़ी उँगली) से (आश्रम द्वारा निर्मित) ‘दंत सुरक्षा’ तेल मल देता हूँ अथवा तो हफ्ते में एक दिन सुबह या रात को नमक और सरसों का तेल मल देता हूँ । अपने पास ऐसी वैदिक पद्धति है और यह सस्ता भी पड़ता है । तो ये ब्रश व पेस्ट का उपयोग करना अपने दाँतों के साथ दुश्मनी करना है । मुँह में से बदबू आती हो तो नमक और काली मिर्च मिलाकर कभी-कभी मंजन करें तो मुँह में से बदबू चली जायेगी । दातुन को चीरकर उसके दो भाग करके उसीसे जीभ भी साफ कर सकते हैं । फिर अच्छी तरह कुल्ले करके मुँह साफ कर लें । दाँतों को इस तरह साफ करें कि उन पर मैल न रहे और मुख से दुर्गंध न आये ।’’
बापूजी ने जीने का सही ढंग सिखाया जीवन का उद्देश्य समझाया
दाँत साफ करना सिखाया
पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘कितने ही लोग तर्जनी (अँगूठे के पासवाली प्रथम उँगली) से दाँत साफ करते हैं । इससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं तथा दाँत जल्दी गिर जाते हैं क्योंकि तर्जनी में विद्युत शक्ति दूसरी उँगलियों की अपेक्षा अधिक होती है । अतः उससे दाँत नहीं घिसने चाहिए और आँखों को भी नहीं मसलना चाहिए ।’’