Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

जीवन सार्थक करने के 3 सूत्र

एक है तोड़ो व जोड़ो, दूसरा है खाली करो और भरो एवं तीसरा है याद करो और भूल जाओ ।

तोड़ो और जोड़ो

नश्वर से स्नेह तोड़ो और शाश्वत से स्नेह जोड़ो । नश्वर की सत्यता और आसक्ति तोड़ना, शाश्वत में प्रीति जोड़ना । देह के साथ के अहं को तोड़ो और आत्मा के साथ, गुरु-तत्त्व के साथ जोड़ो । विकारों से नाता तोड़ो, निर्विकारी सुख से जोड़ो । नश्वर से मन का संबंध तोड़ो, शाश्वत से जोड़ो । जिन वस्तुओं या विषयों की मृत्यु हो जाती है उनसे मृत्यु के पहले ही आसक्ति या संबंध तोड़ो और जो मृत्यु के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ता उससे संबंध जोड़ो । 

कबिरा इह जग आयके, बहुत से कीन्हे मीत । 

जिन दिल बाँधा एक से, वे सोये निश्चिंत ।।

एक परमात्मा, सद्गुरु से दिल जोड़ दो और अनेक विषय-विकारों से दिल तोड़ दो । कर्ता किये बिना रह नहीं सकता और कर्ता कर्म करता है तो बंधन हुए बिना रह नहीं सकता लेकिन वही कर्म अगर प्रभु से जुड़ने के लिए करता है और विकारों से छूटने एवं कर्ताभाव तोड़ने के लिए करता है तो कर्ता ‘अकर्ता आत्मपद’ में प्रतिष्ठित हो जाता है । यह बहुत ऊँची बात है, बहुत ऊँचा लाभ देनेवाली है । केवल यह चलते-फिरते ध्यान रहे बस, आप जग जाओगे ।

‘महाराज ! जगते तो रोज हैं ।’

नहीं जगते बाबा ! यह तो शरीर जगा, आप जग जाओ । कैसे जगें ? जगने की क्या निशानी ?

जानिअ तबहिं जीव जग जागा । 

जब सब बिषय बिलास बिरागा ।। 

(श्री रामचरित. अयो.कां. : 92.2)

असली सुख में प्रीति और विकारी सुख से वैराग्य । नश्वर सुख से उपरामता और शाश्वत सुख में आनंद आये, प्रीति बढ़े । अंतर के सुख में मन लगे तो समझो कि आप जगने की तरफ हो । भीष्म पितामह तोड़ने-जोड़ने में सफल व्यक्तित्व के धनी थे । भीष्मजी ने देह से सत्यता तोड़ दी थी और श्रीकृष्ण से प्रीति जोड़ रखी थी तो भगवान कृष्ण ने भी अपने प्यारे भीष्म की प्रतिज्ञा को सत्य बनाये रखने के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी और भीष्म से नाता जोड़ के दिखा दिया । आप जितने भगवान के, गुरु के होते हो वे उससे कई गुना आपके हो जाते हैं ।

भीष्म कहते हैं : ‘‘श्रीकृष्ण ! मैं अपनी कन्या आपको दान करना चाहता हूँ ।’’

अब डेढ़ सौ साल के ब्रह्मचारी कन्यादान कहाँ से करेंगे ? कौन-सी कन्या लायेंगे ? बोले : ‘‘मेरी बुद्धिरूपी जो कन्या है वह मैं आपको अर्पित करता हूँ ।’’

तो बुद्धि भगवान से जोड़ दो । प्रभात को उठो, थोड़ा शांत हो जाओ । ‘बुद्धि में प्रकाश तेरा है, हम तेरे प्रकाश में जियें । मैं तेरा, तू मेरा । शरीर मेरा नहीं और संबंध मेरे नहीं ।’ इतना याद करने से भी तोड़ने और जोड़ने की शुरुआत हो जायेगी । 

खाली करो और भरो

मन को विकारों व देहाध्यास से खाली करते जाओ और भगवत्प्रीति, भगवद्भाव, भगवद्ध्यान, भगवत्संबंध से भरते जाओ । फिर चाहे भगवान गुरु के भीतर प्रकट हुए हैं तब भी, श्रीकृष्ण के अंतःकरण में छलक रहे हैं तब भी... जिस भगवान में प्रीति हो । अपने चित्त से कर्ताभाव को खाली करो और द्रष्टाभाव को भरो । सुख-दुःख की तरंगोंवाले मसाले को खाली करो और समता को भरो । मान-अपमान को सत्य मानने के बुद्धि में जो संस्कार पड़े हैं उनको खाली करो और ‘मान-अपमान सपना है’ इस ज्ञान को, समता को भरो ।

याद करो और भूल जाओ

जो काम करना है उसे याद किया... और किया तो फिर कर्तापन को भूल जाओ । काम करने में जो सुख-दुःख आया या जैसा भी परिणाम आया उसे याद करो, सावधान रहो लेकिन उसकी सत्यता को भूल जाओ । 

इन 3 सूत्रों को जीवन में लाओगे तो परम सुख में टिकने में आसानी हो जायेगी, मनुष्य-जीवन सार्थक हो जायेगा, जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जायेगा ।     

REF: RP-ISSUE365-MAY-2023