पूज्य बापूजी का पावन संदेश
आप स्वधर्म में आ जाओ !
भगवद्गीता (3.35) में आता है :
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।।
स्वधर्म में अपने अहं का, अपनी इच्छा-वासनाओं का निधन हो जाय तो कोई बात नहीं, अच्छा ही है, वांछनीय है किंतु परधर्म तो भयावह है । आत्मा-परमात्मा की अनुभूति के लिए धन का त्याग करना पड़े तो करो, प्राणों का त्याग करना पड़े तो करो । लोगों ने किया है - मंसूर सूली पर चढ़ गये । मंसूर बोलते थे ‘अनलहक (मैं खुदा हूँ)’ ।
बोले : ‘‘अनलहक-अनलहक’ बोलोगे तो सूली पर चढ़ाये जाओगे ।’’
मंसूर बोले : ‘‘अरे, खुदा मेरा आत्मा है, मेरा अनुभव है, सूली पर चढ़ना पड़े तो मैं चढ़ जाऊँगा ।’’
और वे बहादुर मंसूर सूली पर चढ़ गये लेकिन अपने को भगवान से अलग बोलना स्वीकार नहीं किया ।
सूर्यनारायण ऋतु-परिवर्तन के अनुसार अपने स्वधर्म में लगे हैं, हवाएँ अपने स्वधर्म में लगी हैं । मनुष्य स्वधर्म में लगता है तो मनुष्यता निखरती है ।
संत भोले बाबा ने कहा है :
होली हुई तब जानिये,
पिचकारी सद्गुरु की लगे,
पिचकारी गुरुज्ञान की लगे ।
सब रंग कच्चे जाँय उड़, एक रंग पक्के में रँगे ।।
पक्का रंग क्या है ? गुरुज्ञान । गुरुज्ञान क्या है ? स्वधर्म । स्व-स्वरूप आत्मा के नजदीक जाने का जो काम है वह है स्वधर्म और उससे विपरीत जाने का जो काम है वह है परधर्म, अधर्म ।
जैसे व्यक्ति अमावस्या-पूर्णिमा को सत्कर्म, ध्यान, जप करे तो हुआ स्वधर्म परंतु संसारी वासना में अंधा होकर पति-पत्नी का सहवास करे तो हो गया परधर्म, अधर्म । इससे संतान पैदा होगी तो विकलांग होगी और संतान पैदा नहीं हुई तो भी परधर्म के पाप का फल - जीवनीशक्ति का ह्रास होगा । फिर कोई भी बीमारी आयेगी तो जल्दी जायेगी नहीं ।
स्वधर्म क्या होता है ? तुम्हारे तन में तंदुरुस्ती व सात्त्विकता आये यह स्वधर्म है और तन में रोग व तामसिकता आये तो यह परधर्म हो गया । जिससे तुम्हारी उन्नति हो वह है स्वधर्म । ‘स्व’ तुम हो, तुम मतलब यह हाड़-मांस का पंचभौतिक शरीर नहीं, मन, बुद्धि, अहंकार नहीं बल्कि इन सबको जो जानता है वह तुम्हारा ‘स्व’ है, वह तुम हो । प्राण एक बार निकलेंगे ही, धन छूटेगा ही तो ‘स्व’ को पानेवाले अंतःकरण की रक्षा करने के लिए प्राण और धन देना पड़े तो दो लेकिन ‘स्व’ आत्मा-परमात्मा को पाओ ।
स्वधर्म में डट गये तो...
मैंने ऐसे कई व्यापारियों को देखा जिन्होंने स्वधर्म पर डट के धंधा किया । शुरुआत में लोगों ने बोला कि ‘ऐसे थोड़े ही धंधा चलता है !’ परंतु उनका धंधा सर्वोपरि हुआ ।
गोधरा में दयालदास नाम के एक व्यापारी थे । उनकी कपड़ों की दुकान थी, एक ही भाव बोलते थे । लोग बोलते : ‘‘कोई 3 रुपया बोलता है फिर डेढ़ में देता है । तुम डेढ़ बोलते हो तो सवा तो करो ।’’
दयालदास बोलते : ‘‘नहीं ।’’
शुरू-शुरू में थोड़ा इधर-उधर हुआ फिर तो उनका धंधा ऐसा चल पड़ा कि एक छोटी-सी दुकान में से 2-4 दुकानें हो गयीं और मैं साधु बना तो उन सत्यनिष्ठ दयालदास के घर गया ।
सदना कसाई का तो मांस बेचने का परम्परागत कर्म है लेकिन कपट नहीं करता और हत्या नहीं करता, ऐसे ही तुलाधार स्वधर्म का पालन हो इस ढंग से काम करता है तो ऐसे लोगों के पास बड़े-बड़े योगियों को जाने की प्रेरणा हुई । शबरी के पास रामजी गये, शबरी स्वधर्म में है न !
रावण को जो करना चाहिए था वह संयम नहीं कर पाया । योग्यताएँ तो रावण में बहुत ऊँची थीं, गजब की थीं पर रावण में दोष केवल यही था कि ‘स्व’ में शांति नहीं पायी, स्वधर्म में नहीं था, कैसे भी करके इन्द्रियों के, विषय-विकारों के सुख में मजा लेता था । इसलिए वह अपनी योग्यताओं को काम में नहीं ला सका । समुद्र को मीठा करने की योग्यता थी उसके पास, सशरीर स्वर्ग में जाने की विद्या उसके पास थी... ऐसी कई योग्यताएँ थीं परंतु परधर्म का मजा लेने में रावण का किया-कराया सब चौपट हो गया । हर दशहरे दे दीयासलाई (उसके पुतले जलाये जाते हैं) ! और शबरी -
सरोवर कांठे शबरी बेठी रटे रामनुं नाम...
एक दिन आवशे स्वामी मारा अंतरना आराम ।
रोम-रोम में रम रहे हैं अंतरात्मा राम परंतु राजा दशरथ के यहाँ साकार राम भी पधारे हैं । शबरी रामजी के वहाँ नहीं जाती । गुरुजी ने उसको कहा कि ‘‘राम आयेंगे तेरे पास ।’’ तो रामजी शबरी के पास गये और स्वधर्म से सम्पन्न शबरी के पवित्र बेर भी खाये । इसका तो इतिहास साक्षी है ।ी