होलिकोत्सव का संदेश
हृदय-ग्रंथि खोलो, अपने स्वभाव को जगाओ
3 मार्च को होलिका दहन (होली) और 4 मार्च को धुलेंडी है । होलिकोत्सव का पूरा लाभ कैसे उठाया जाय इस बारे में पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है :
जो उत्कृष्ट सुख दे, शांति दे, स्वास्थ्य दे, राग और द्वेष को क्षीण करे, समता और सहजता में, सुमधुर आत्मशांति में प्रवेश पाने का अवसर दे वह है होलिकोत्सव । यह उत्सव वैदिक काल से चला आ रहा है । संत भोलेबाबा ने कहा है :
होली हुई तब जानिये,
पिचकारी सद्गुरु की लगे,
पिचकारी गुरुज्ञान की लगे ।
सब रंग कच्चे जाँय उड़, एक रंग पक्के में रँगे ।
कच्चा रंग परधर्म है । पक्का रंग तो परमात्म-ज्ञान, परमात्म-ध्यान है और वह पक्का रंग कैसे लगता है ? कि
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः ।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् ।।
उद्यमी-साहसी बनो, धैर्यवान-बुद्धिमान बनो, शक्तिशाली-पराक्रमी बनो तो पद-पद पर परमात्मा, स्वधर्म तुम्हारी रक्षा करता है ।
होली - ‘हो... ली...’ जो हो गया भूल जाओ, बीते हुए का शोक न करो, हृदय-ग्रंथि खोलो, अपने स्वभाव को जगाओ । तुम्हारा स्वभाव आनंद है, वैर तुम्हारा स्वभाव नहीं है । वैर तो ऐसे ही है, तुम्हारा रामस्वभाव है । राम तो है शुद्ध निर्विकार, काम है विकार, राम-रस है शाश्वत, काम-रस थोड़ी देर में ठुस्स (शक्तिहीन बनाकर चला जाता है) ! बिल्कुल सच्ची बात, पक्की बात है ! तुम्हारे स्वभाव में तुम जागो । जागो जोगी, जागो ! ॐ आनंद !
योगी संयम, नियम, आसन, प्राणायाम करके समाधि लगाते हैं तब उनको चित्त की शांति, सुख मिलता है परंतु समाधि हटी तो फिर संसार की सत्यता... आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ तो सत्यता लगेगी लेकिन तत्त्वज्ञान में संसार की सत्यता बाधित हो जाती है फिर तो चलते-फिरते योग... भगवान श्रीकृष्ण ने इसका नाम दिया ‘अविकम्प योग’ ।
समाधि में योग तो है, सामर्थ्य भी है, यशस्विता भी है, इच्छाशक्ति भी तीव्र होती है, सूझबूझ भी काफी होती है परंतु वह योग कम्पित हो जाता है । श्रीकृष्ण का, श्रीरामजी का, जनक राजा का जो ब्रह्मज्ञान के द्वारा योग हुआ वह अविकम्प योग है । तो होलिकोत्सव अविकम्प योग का प्रसाद देने में, सूझबूझ देने में और स्वास्थ्य देने में सक्षम है ।
इस समय सोना यानी भाग्य को खोना
होली, महाशिवरात्रि, दिवाली, जन्माष्टमी की रात्रि में जो कुछ साधन-भजन किया जाता है वह अतिशीघ्र लाभ देता है । इन्हें कभी छोड़ना ही नहीं चाहिए । इन रात्रियों में सोना मतलब अपने भाग्य को खोना है । ये रात्रियाँ जागरण की हैं । इन रात्रियों में जप लाख गुना फल देता है । एक दिन में तो लाख माला नहीं होंगी परंतु इन 4 रात्रियों में एकाग्रचित्त होकर एक माला की तो लाख माला की बराबरी हो जाती है । गुरुमंत्र का जप तो करना ही है परंतु असाधन न हो इसलिए इस मंत्र का जप भी करो । तुम्हारे लिए बहुत जरूरी मंत्र है : ‘ॐ अर्यमायै नमः ।’ इस दिन विशेषरूप से इस मंत्र का जप होना ही चाहिए । यह तबाही से रक्षा करनेवाला मंत्र है । अर्यमा देव संयम की मूर्ति हैं, ब्रह्मज्ञानी हैं । उनको नमन किया तो हो गयी ब्रह्मचर्य में सफलता । आदर से इस मंत्र का अनुष्ठान करो इस संकल्प से कि ‘गंदी आदत है हस्तमैथुन की... फलाना-ढिमका जो भी पाप हैं वे सब जल जायें और मेरा ब्रह्मचर्य दृढ़ हो जाय ।’ इस मंत्र का तो गजब का फायदा होता है !
होली के बाद स्वास्थ्य-सुरक्षा
इस ऋतु में ऐसा खुराक खाओ कि आपका शरीर, मन, बुद्धि सुयोग्य बनें, सत्त्व में जग जायें ।
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं...
सत्त्व से, सत्त्वगुण की अधिकता से आत्मज्ञान में स्थिति होती है । भविष्य पुराण में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि ‘फाल्गुनी उत्सव परम पवित्र, आनंददायी, विजयदायी, सभी विघ्नों को दूर करनेवाला है ।’ विषाद, भय, अहं, चिंता छोड़ के झूमने-झुमानेवाला है ।
18 फरवरी से 20 अप्रैल तक वसंत ऋतु है । वसंत पंचमी से देवशयनी एकादशी तक वसंत राग सुनने में आनंद, आह्लाद और प्रसन्नता भरपूर मिलती है ।
होली ऋतु-परिवर्तन का पर्व है । इस पूर्णिमा से सूरज की सीधी किरणें धरती पर पड़ेंगी, गर्मी बढ़ेगी ।
* होली से लेकर 20 दिन तक बिना नमक वाला भोजन करें तो स्वास्थ्य बहुत बढ़िया रहेगा । बिना नमक वाला नहीं कर सकते तो नमक एकदम कम लें । हम तो दूध-दलिया खा लेते हैं । दूध-रोटी भी खायें तो नमक की जरूरत नहीं । स्वास्थ्य की बड़ी रक्षा रहती है, चर्मरोग तो होते ही नहीं ।
* चैत्र मास में नीम के 20-25 कोमल पत्ते सुबह 1-2 काली मिर्च के साथ लेने ही चाहिए । (षष्ठी तिथि को नीम के पत्ते नहीं खाने चाहिए ।)
* शरीर में जो कफ और चरबी जमा है, गर्मी के कारण उसके अंश पिघल के जठर में आते हैं तो भूख कम हो जायेगी । इस समय ज्वार की धानी, ज्वार की रोटी खाना हितावह है ।
पलाश के रंग से खेलें होली
पलाश के रंग से होली खेलने से सप्तरंग संतुलित होते हैं । होली खेलते समय कपड़े इस रंग से गीले होते हैं, जिससे रोमकूपों को रंग सोखने का अवसर मिलता है । पलाश के फूलों के रंग से होली खेलने से, नाचने, कूदने-फाँदने से पित्त-संबंधी कई ढीठ बीमारियाँ तथा शरीर में कफ-संबंधी छोटी-मोटी गाँठें जमा हैं, जो ट्यूमर बनाकर सर्जरी करवाती हैं अथवा ब्रेन ट्यूमर बन जाती हैं उन सबको विदाई देने की इस ऋतु में बहुत सुंदर व्यवस्था है ।