(15 फरवरी : महाशिवरात्रि पर विशेष)
महाशिवरात्रि उत्सव नहीं है, तपस्या का पर्व है । इस दिन जागरण करो, जप करो, ध्यान करो । शिवरात्रि का जागरण... आहा !
स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते ।
जिसके जीवन में अल्प पुण्य हैं उनको व्रत-उपवास में महत्त्वबुद्धि नहीं होती है । लेकिन अनजाने में भी महाशिवरात्रि की रात्रि को जग गये तो दुस्सह नाम के शिकारी में से राजा विचित्रवीर्य बने और फिर भगवान वीरभद्र हो के अब भी पूजे जाते हैं । तो इस पर्व का धन इकट्ठा करो ।
बड़ी सार बात है कि महाशिवरात्रि का व्रत न करने से पाप लगता है लेकिन करने से ऐसी बुद्धि होती है जैसी सतयुग, त्रेता और द्वापर के लोगों की होती थी और वही पुण्यलाभ प्राप्त होता है जो उस काल में मिलता था क्योंकि काल के प्रभाव से जो देव, तीर्थ, पुण्य लुप्त हो गये हैं वे शिवरात्रि के दिन पूर्णतः विद्यमान होते हैं । इसीलिए इस दिन का जागरण सब पर्वों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है । इस दिन का जागरण जीवन में बड़ी बरकत लाता है और जो शुभ कर्म किये जाते हैं वे अनंत गुना फल देते हैं ।
‘शिव’ माने कल्याणकारी । सत्यं शिवं सुन्दरम् । वे सत्यस्वरूप हैं, कल्याणस्वरूप हैं, हितकारी हैं । महाशिवरात्रि की रात को सारे तीर्थों और सारे देवों का धरती पर अस्तित्व, प्रभाव रहता है । इसलिए सबके मन अच्छे रहते हैं, शांति रहती है, प्रसन्नता रहती है ।
महाशिवरात्रि को शिवभक्तों के जीवन में आह्लाद तो होता ही है, बिल्कुल यह प्रत्यक्ष है । यह तिथि-त्यौहारों का प्रभाव भी है और शिवजी-वसिष्ठजी का संवाद भी ऐसा है कि हस्तामलकवत् ब्रह्मज्ञान हो जाय । ‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ में वसिष्ठजी महाराज को शिवजी बोलते हैं : ‘न सर्व देवताओं के अधिपति इन्द्र देव हैं, न कमलोद्भव ब्रह्मा देव हैं, न पुंडरीकाक्ष विष्णु देव हैं, न त्रिलोचन महादेव देव हैं, वास्तविक देव वह है जो भूताकाश, चित्ताकाश को जानता है चिदाकाश, उस देव को मेरा प्रणाम है । मेरे साकार रूप का पूजन प्रारम्भ के उपासकों के लिए कहा है । कारण कि जो योजनपर्यंत नहीं चल सकता उसको दो कोस चलना भी अच्छा ही है ।’
ऐ भोलेबाबा ! क्या तुम्हारी सच्चाई है, क्या सूझबूझ है, क्या पहुँच है ! चिद्घन चैतन्य है शिवजी का असली स्वरूप और शिवजी अपने असली स्वरूप का वर्णन इसलिए कर रहे हैं कि तुम भी अपने असली स्वरूप को ‘मैं’रूप में जान लो । कितनी उदारता है ब्रह्मज्ञानी भगवान शिवजी की, ब्रह्मस्वरूप शिवजी की !
जागरण, जप व सत्कर्म महाफलदायी
महाशिवरात्रि के 15-17 दिन बाद होली आती है । ये दोनों महापर्व हैं, इनमें आप सावधान रहें ।
शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत् ।
लक्षं त्यक्त्वा तु दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत् ।।
‘सौ काम छोड़ के समय से भोजन कर लो, हजार काम छोड़ के स्नान कर लो, लाख काम छोड़ के दान कर लो और करोड़ काम छोड़ के हरि का भजन कर लो ।’ यह शास्त्र की आज्ञा है । जिससे सब जाना जाता है उसको खोज लो !
खोजत-खोजत कबीरो गयो हेराई ।
खोजते-खोजते कबीरजी खो गये, जिसको खोजते थे वही हो गये । अपने को थोड़ा खोजो । अब खोजते-खोजते सोने का रोज रात का नियम बना लो । महाशिवरात्रि एवं होली की रात्रि को तो जरूर करो । महाशिवरात्रि व होली को उपवास करोगे, जप करोगे, दान, पुण्य, सत्कर्म करोगे तो उसका अनंत गुना फल होता है । मेरे को हुआ न ! मैं आपको सच बताता हूँ, मैं घर में था तो एक शिवरात्रि को एक एकांत मंदिर में गया । वहाँ ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय... जप किया और जागरण किया । उसके बाद तो मेरे जीवन में शिव-तत्त्व को पाने के द्वार ही खुल गये । महाशिवरात्रि का महान व्रत इतना मुझे फला । अभी तक वह फल काम कर रहा है । कई आफतें आयीं, कितनी वाहवाही आयी, क्या-क्या हुआ, सब धर जूते के तल्ले, बल्ले-बल्ले ! हम अब भी उपवास करते हैं परंतु निर्जल नहीं, थोड़ा फलाहार जैसा लेकर । होली का भी ऐसा ही है । महाशिवरात्रि की रात, होली की रात, जन्माष्टमी की रात, दिवाली की रात - ये चार महारात्रियाँ कभी छोड़ना नहीं । जागरण, भगवन्नाम-जप और सत्कर्म । हो सके तो कड़ा उपवास करो, नहीं तो फिर फल-वल आदि पर रहो ।
REF: RP-ISSUE397-JANUARY-2026