Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

नारदजी द्वारा भक्ति के दुःखों की निवृत्ति

(पूज्य बापूजी के सत्संग से)

(2 मई : देवर्षि नारद जयंती पर विशेष)

नारद का अर्थ है : ‘नारायण - परमात्मा और जीवात्मा दोनों के बीच जो तादात्म्य स्थापित करे, जीव को ईश्वर से मिलाने की जो व्यवस्था करे । नाड़ (नाल) से जन्मनेवाले जीव को जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त करा दे ।’

नराणां समूहः इति नारम् ।

नर-नारी के समूह के अंतःकरण में जो नारायण बैठा है उसकी भक्ति और उसका रस जो दिला दे उसका नाम है नारद । 

श्रीमद्भागवत-माहात्म्य के प्रथम अध्याय में कथा आती है :

भक्ति के पुत्र ज्ञान और वैराग्य को मूचि्र्छत देखकर दयालु नारदजी को दया आयी । भक्ति ने अपना दुःख बताया । नारदजी कहते हैं कि ‘‘बाले ! तू दुःखी मत हो । मैं तेरा दुःख दूर करने का अवश्य प्रयत्न करूँगा ।’’ 

भक्ति रो रही है और हमें यही सीख दे रही है कि अगर भक्ति करनी है तो ज्ञान और वैराग्य को जागृत रखो । तुम जिसकी भक्ति करते हो उस परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान ही न होगा तो तुम किसकी भक्ति करोगे ? ‘भगवान क्या है ? आत्मा क्या है ? मुक्ति कैसे होती है ? वह परमात्मा हमारा आत्मा है तो मिले कैसे ? जगत की उत्पत्ति कैसे हुई ? बदलनेवाले जगत को भी जो देख रहा है, वह अबदल तत्त्व क्या है ?’ ऐसा ज्ञान होना चाहिए और सुख-दुःख व संसार के राग-द्वेष की निवृत्ति के लिए वैराग्य होना चाहिए । अगर जीवन में भक्ति के साथ ज्ञान-वैराग्य नहीं होंगे तो भक्ति रोती रहेगी ।

भक्ति कहती है : ‘‘महाराज ! मेरा सौभाग्य था जो आपका समागम हुआ ।

साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धिकरं परम् । 

‘संसार में साधुओं का दर्शन ही समस्त सिद्धियों का परम कारण है ।’ (श्रीमद्भागवत माहात्म्य, अध्याय 1, श्लोक 79)

साधुपुरुष का दर्शन, भगवान की कथा और हरि का नाम-संकीर्तन - ये कलियुग में पाप-ताप और दोषों को निवृत्त करनेवाले हैं, दुःख-दरिद्रता मिटाने का अमोघ साधन हैं ।’’

 नारदजी भक्ति के पुत्रों को बार-बार वेद-पाठ सुना के, गीता-पाठ करके सजग करते हैं लेकिन कभी-कभार थोड़ा जग के वे फिर मूचि्र्छत हो जाते हैं । नारदजी सोचते हैं, ‘मुझे उपाय समझ में नहीं आता । हे प्रभु ! इनका दुःख कैसे मिटे ?’

आकाशवाणी हुई : ‘‘नारद ! तुम उद्योग करो, सफल होओगे ।’’

 नारदजी सोचते हैं कि ‘आकाशवाणी ने भी स्पष्ट नहीं कहा, उद्योग करें पर क्या उद्योग करें ?’ 

नारदजी नगर-नगर, डगर-डगर, आश्रम-आश्रम घूमने लगे कि ‘ज्ञान और वैराग्य की मूर्च्छा कैसे मिटे, भक्ति का दुःख दूर कैसे हो ?’

साधु लोग कहते हैं कि ‘‘नारदजी ! जो आपको नहीं आता उसको हम कैसे बता सकते हैं ?’’

नारदजी ने सोचा कि ‘इसका दुःख तो दूर करना है, जाऊँ हिमालय में तपस्या, ध्यान करूँ ।’ विशालापुरी में सनकादि ऋषियों ने देखा कि नारदजी उदास हैं और जल्दी-जल्दी जा रहे हैं । उन्होंने पूछा : ‘‘देवर्षि नारद ! आप तो संतपुरुष हैं, आप विह्वल पुरुष की नाईं कहाँ जा रहे हैं ?’’

नारदजी बोले : ‘‘महाराज ! कलियुग ने प्रवेश किया है । लोग मंद मति के हो गये हैं । मौत आयेगी, सब छोड़ के जाना है - यह भी नहीं समझते । ब्राह्मण तो धन लेकर विद्या पढ़ा रहे हैं, कथा का सार लोभी होने के कारण चला गया और तीर्थों का सार पाखंडियों के कारण चला गया । तपस्या का सार ढोंगियों के कारण चला गया । कलियुग ने सब निःसार कर दिया । लोग यंत्र की नाईं कमाना-खाना, खाना-कमाना यह करते-करते अंत में कलहप्रिय होकर मर जाते हैं । श्रीरंग, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, प्रयाग, सेतुबंध आदि कई तीर्थों में घूमा, कहीं शांति नहीं मिली । कहीं मन भगवान में लग जाय, ध्यानस्थ हो जाय ऐसी जगह नहीं है । घूमते-घूमते वृंदावन में आया, वहाँ मैंने एक युवती रोती देखी, उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध हैं, उनकी सजगता के लिए मैं उद्योग करना चाहता था लेकिन आकाशवाणी ने भी स्पष्ट नहीं बताया । उपाय जानने के लिए बदरीवन में तप करने आया था । महाराज ! आप ज्ञातज्ञेय हैं, कृपा करके उनके कल्याण का उपाय बताइये ।’’

सनकादि ऋषि कहते हैं : ‘‘भगवत्कथा से ज्ञान व वैराग्य सजग होंगे और भक्ति का दुःख दूर होगा, मनुष्यों का दुःख दूर होगा । भगवत्कथा से भगवदाकार वृत्ति पैदा होती है, भगवन्नाम-कीर्तन से रक्त के कण पावन होते हैं, भगवद्ध्यान से भगवद्भाव उत्पन्न होता है । देवर्षि ! उस युवती के दुःख को दूर करने के लिए तुम श्रीमद्भागवत की कथा का आयोजन करो ।’’ 

हालाँकि नारदजी ने ब्रह्माजी के मुख से भागवत की बात सुनी थी परंतु भागवत सप्ताह श्रवण की विधि सनकादि ऋषियों ने सुनायी । पहले दिन कथा सुनने से हृदय पवित्र होता है, दूसरे दिन हृदय में कुछ-न-कुछ आनंद और पुण्य उभरने लगता है, तीसरे दिन और अच्छा लगता है, रस बढ़ने लगता है । ज्यों-ज्यों कथा सुनते जाते हैं त्यों-त्यों चित्त पावन होता जाता है । 

देवर्षि नारदजी ने भगवत्कथा की सुंदर व्यवस्था की । जो मान के बिना नहीं आ सकते थे उनको मानसहित बुलाया गया और जो हरिकथा के प्यासे थे, सुनकर आनेवाले थे उनको संदेशा भेजा । सुंदर मंडप की व्यवस्था की और श्रीमद्भागवत कथा आरम्भ की । ऋषि, मुनि, यति, जोगी, तपस्वी आये, गंगा आदि नदियाँ, गंधर्व और दानव आदि भी अपना भाग्य बनाने के लिए कथा-श्रवण को आये । 

श्रीमद्भागवतं पुण्यमायुरारोग्यपुष्टिदम् ।

पठनाच्छ्रवणाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।

‘यह पावन पुराण श्रीमद्भागवत आयु, आरोग्य और पुष्टि को देनेवाला है । इसका पाठ अथवा श्रवण करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।’ (श्रीमद्भागवत माहात्म्य, श्लोक 18)

इस भागवत के 4 नाम हैं :

(1) श्रीमद्भागवत (2) परमहंस संहिता कारण कि शुकदेवजी जैसे महापुरुष ब्रह्मसुख में अधिक मग्न होने के लिए सुनते हैं । (3) कल्पद्रुम : जो मनोकामना रखकर श्रवण-मनन करोगे वह मनोकामना देर-सवेर पूरी होती है । (4) भागवत महापुराण । शेष 17 पुराणों को पुराण कहते हैं परंतु इसे महापुराण कहा जाता है क्योंकि इसमें जगह-जगह पर उस महान तत्त्व का चिंतन और ज्ञान की बातें विशेष मिलती हैं । श्रीमद्भागवत सुनने से बुद्धि की शुद्धि होती है, राग और द्वेष की निवृत्ति होती है ।

 

REF: ISSUE400-APRIL-2026