- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू
फाल्गुन (अमावस्यांत माघ) मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आनेवाली यह महाशिवरात्रि, कल्याणकारी रात्रि तपस्या का पर्व है । महाशिवरात्रि को जितना हो सके एकांत में रहना, जैसे भगवान साम्बसदाशिव समाधि में रहते हैं । विज्ञान की दृष्टि से भी भजन, ध्यान के लिए यह महारात्रि बड़ी उपयोगी है ।
इस महारात्रि का महत्त्व बताते हुए भीष्म पितामह कहते हैं : ‘‘युधिष्ठिर ! भगवान साम्बसदाशिव की महिमा ध्यान से सुनो । चित्रभानु सुख-वैभव से सम्पन्न राजा था । महाशिवरात्रि के दिन उसके पास अष्टावक्र मुनि आये । राजा ने व्रत रखा था ।
अष्टावक्रजी ने पूछा : ‘‘तुम इतने विचारवान हो और तुम्हारे पास इतनी सुख-सम्पदा है फिर महाशिवरात्रि का व्रत क्यों रख रहे हो ?’’
चित्रभानु ने कहा : ‘‘मुनीश्वर ! ईश्वर की कृपा से मुझे पिछले जन्म की स्मृति है । मैं पिछले जन्म में शिकारी था । पशुओं को मारता और उन्हें बेचकर गुजारा करता था । महाशिवरात्रि का दिन था । मैं जंगल में शिकार करने गया तो लौटते-लौटते रात हो गयी, जिसके कारण मैं रास्ता भटक गया । घर जाने में असमर्थ था तो आश्रय के लिए मैं एक बिल्ववृक्ष पर चढ़ गया । दैवयोग से उस पेड़ के नीचे शिवलिंग था । अनजाने में मेरा रात्रि-जागरण हो गया और भटक गया था इसलिए भूखा भी रहा तो उपवास हो गया । वहाँ बैठे-बैठे ऐसे ही बिल्वपत्र तोड़ता था, वे बिल्वपत्र बिल्ववृक्ष के नीचे स्थित शिवलिंग पर गिरते जाते थे तो अनजाने में मेरे द्वारा शिवजी की पूजा हो गयी । उस रात के बाद मेरे चित्त में पाप की रुचि कम होने लगी और भगवान की आराधना का कुछ भाव जगा ।
मैं जब मरा तो मुझे भगवान शिव के पार्षद ले गये । कई वर्ष मैं शिवलोक में रहा और शिवजी की कृपा से इस समय मैं चित्रभानु राजा हो के राज्य कर रहा हूँ । शिव-तत्त्व को नहीं जाना, केवल अनजाने में की गयी शिवलिंग की पूजा का और एक रात्रि-जागरण का इतना पुण्य हुआ । यह राज्य तो एक दिन छूट जायेगा, उसके पहले शिव-तत्त्व का ज्ञान हो जाय इसलिए मैं शिवजी को रिझाने का काम कर रहा हूँ ।’’
संसार जिस चित्रभानु को रिझाने के लिए लालायित है वह चित्रभानु शिवजी को रिझा रहा है कि ‘हे प्रभु ! हमारे हृदय में जो शिव-तत्त्व है वह जागृत हो जाय । हे दुनिया की झंझटो ! हे अहंकार से सजे हुए सुखो ! दूर हटो, मैं तो प्रभु के सुख में सुखी हो रहा हूँ । मैं ईश्वरीय शांति में विश्रांति ले रहा हूँ । जन्म-जन्म के मेरे पाप कट रहे हैं ।...’ इस प्रकार आत्मशिव की पूजा करता-करता राजा चित्रभानु अपने ऐहिक व्यवहार और परमार्थ - दोनों को साधता हुआ, साधु-संगति व सत्संग का अवलम्बन लेता हुआ अमरत्व को प्राप्त हुआ ।
जब एक शिकारी अनजाने में भी शिवपूजा करके भोग और मोक्ष पा सकता है तो एक साधक या भक्त जान के प्रेम से पूजा करता है तो उसके भोग और मोक्ष की व्यवस्था कुदरत (प्रकृति) कर ले तो इसमें क्या आश्चर्य है ?
जब-जब समय मिले तब-तब भीतर प्रार्थना कर लेना कि ‘हे प्रभु ! बाहर भटकने का मन का स्वभाव है परंतु तेरी कृपा मेरा स्वभाव बदलने में पूर्ण समर्थ है । प्रभु ! तू तेरे शिवस्वरूप में मुझे डुबा दे ।...’
अपने शिवस्वभाव को जागृत करें
तत्त्वदृष्टि से जिनकी मति सूक्ष्म है और जिनका शिवस्वरूप को समझने में अधिकार है वे लोग आत्मशिव का पूजन करें, ध्यान करें, उन्हें अंतरात्मा का सुख प्राप्त हो और जिनकी मति इतनी सूक्ष्म नहीं है वे शिवमूर्ति या शिवलिंग का पूजन कर हृदय में शिव-संकल्प विकसित करें, अपने शिवस्वभाव, कल्याणस्वभाव, आत्मस्वभाव को जागृत करें ।
बिल्वपत्र-अर्पण का तात्त्विक अर्थ
शिवजी की पूजा गरीब-से-गरीब व्यक्ति भी कर सकता है । केवल एक लोटा पानी अर्पण करके भी वह अपने को भाव और प्रेम से पावन कर सकता है । बिल्वपत्र अर्पण करने का अर्थ है कि सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण - ये तीनों गुण संसार की माया के मुख्य संचालक हैं । ये तीनों गुण माया के हैं । ‘माया और गुणों को सत्ता देनेवाले कल्याणस्वरूप आत्मशिव को, अंतर्यामी शिव, सर्वव्यापी विश्वात्मा सच्चिदानंद शिव को मेरे तीनों गुणों के कर्म और स्वभाव अर्पण करता हूँ ।’ - ऐसा भाव करके जो निरहंकार होता है वह आत्मशिव को शीघ्र ही पा लेता है ।
पंचामृत-पूजा का तात्त्विक अर्थ
पंचामृत-पूजा क्या है ? पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - इन पंचमहाभूतों का ही सारा भौतिक विलास है । इन पंचमहाभूतों का भौतिक विलास जिस चैतन्य की सत्ता से हो रहा है उस चैतन्यस्वरूप आत्मशिव में अपने अहं को अर्पित कर देना, यही पंचामृत-पूजा है । ‘पाँचों भूत और इनसे बने हुए भौतिक पदार्थ - यह सब-का-सब अधिष्ठानरूप आत्मशिव के आधार से है ।’ - ऐसा सोचकर जो इस पंचभूतों के मिश्रणरूप जगत में कर्ता-भोक्तापने का भाव न रख के परमात्मशिव के संतोष के लिए तटस्थ भाव से - पक्षपातरहित, राग-द्वेषरहित भाव से व्यवहार करता है, वह शिव की ही पूजा करता है । आत्मशिव के संतोष व प्रसन्नता के लिए जो संयम से खाता-पीता, लेता-देता है, भोगबुद्धि से नहीं निर्वाह-बुद्धि से करता है उसका तो भोजन करना भी पूजा हो जाता है ।
शिवपूजा का विधान जो समझ लेगा फिर करे-न करे, केवल सुननेमात्र से उसे बहुत लाभ होता है । शिव-तत्त्व की उपासना करने की युक्ति आ जाय तो शांति, मैत्री, करुणा, समता, सहजता, सरलता - ये सद्गुण तत्काल स्वाभाविक आने लगते हैं ।
यदि ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के द्वारा शिवतत्त्व को समझकर थोड़ा-बहुत ध्यान सीख जाओ तो तुम्हारा तो कल्याण होगा, तुम्हारी 21 पीढ़ियाँ भी तर जायेंगी !
REF: ISSUE361-JANUARY-2023