भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -
तमेवशरणंगच्छसर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परांशान्तिंस्थानंप्राप्स्यसिशाश्वतम् ।।
‘हे भारत ! तू संपूर्ण भाव से उस ईश्वर की शरण चला जा । उसकी कृपा से तू परम शांति और शाश्वत स्थान को प्राप्त हो जायेगा ।’
(गीता - 18.62)
‘परम शांति’ का मतलब है संसार के आकर्षणों से उपरति और ‘शाश्वत स्थान’ का मतलब है परम पद, आत्मपद । यह कैसे मिलेगा ?
तू अपने अहं की शरण छोड़, अपनी मान्यताओं की शरण छोड़, देहाध्यास की शरण छोड़ और उस अंतर्यामी की शरण चला जा ।
वर्तमान वस्तु का अनादर, आनेवाले की इंतजारी और बीते हुए का सुमिरन करना- यह मनुष्य-जाति का आश्चर्यकारक स्वभाव रहा है । इसे मनुष्य की कमजोरी कहो, दुर्भाग्य कहो, जो कहो । भगवान साथ में हैं लेकिन अर्जुन भगवान के सान्निध्य का पूरा फायदा नहीं ले रहा है, इसलिए भगवान ने कहा : मेरी पूर्ण शरण नहीं लेता है, मेरी बात नहीं मानता है तो फिर तू अंतर्यामी की शरण चला जा ।
वास्तव में अंतर्यामी आत्मा-परमात्मा और श्रीकृष्ण अभिन्न-एक ही हैं । फिर भी अर्जुन को साकार स्वरूप में श्रद्धा नहीं होती तो भगवान कहते हैं - अंतर्यामी की शरण जा । कैसे भी करके अपना कल्याण कर ।
‘अंतर्यामी की शरण’ का मतलब है जो तुम्हारे मन, बुद्धि और इन्द्रियों का आधारभूत साक्षी परमात्मा है, जो करन-करावनहार है । उसीकी प्रेरणा, उसीकी कृपा और उसीके साथ तादात्म्य करके तुम अपने चित्त को जोड़ दो, इससे कार्य करने का बोझा अथवा कर्म करने का बंधन तुम्हारे सिर से हट जायेगा, तुम्हारा मस्तिष्क और अंतःकरण निर्भार होने लगेगा ।
कर्म करना तुम्हारा स्वभाव है । शरीर प्रकृति का है । क्रिया से ही शरीर पैदा हुआ, क्रिया से ही जी रहा है, सतत क्रिया हो रही है । जो ईश्वर-प्रीत्यर्थक्रिया करते हैं वे भगवान की शरण होते हैं । जो मनुष्य भगवान की शरण छोड़कर किसी और की शरण लेता है उसको देर-सवेर रोना ही पड़ता है ।
हर मनुष्य, हर जीव बड़े की शरण लेता है और जो बड़ा दिखता है वह और किसी बड़े की शरण लेता है और बड़ा और बड़े की शरण लेता है । हर छोटा आदमी अपने से कुछ बड़े की शरण लेता है लेकिन उसकी अपेक्षा बड़े-में-बड़ा जो है, वह जिसके साथ जुड़ा है उसीके साथ सीधा जुड़ जाय तो बेड़ा पार हो जायेगा, निहाल हो जायेगा। सच बात तो यह है कि जाने-अनजाने हम जितने अंश में भगवान की शरण होते हैं, उतने ही अंश में हम निर्भार, निर्द्वन्द्व औैर सुखी होते हैं । अगर भगवान को छोड़कर और किसी सेठ, साहूकार, धन, पदवी, चतुराई, बेईमानी या और किसी वस्तु-व्यक्ति की शरण होते हैं, किसी पद की शरण होते हैं तो हमारे अंतःकरण में पूरी निश्चिंतता नहीं होती है । संत कबीरजी ने सुंदर कहा है -
कबीरा इह जग आयके बहुत से कीन्हे मीत ।
जिन दिल बॉंधा एक से वे सोये निश्चिन्त ।।
जिसने एक परमात्मा से दिल बाँधा है वह निश्चिंत रहेगा, बाकी तो मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को रिझा लो लेकिन अंतर्यामी परमात्मा से बिगाड़ते हो तो सब बिगड़े हुए मिलेंगे और तुम अंतर्यामी आत्मा से तादात्म्य करते हो तो तुम्हारे बिना रिझाये सब रीझे हुए मिलेंगे और तुम्हारे दर्शन करके आशीर्वाद के लिए लोग कतारें लगाकर भी अपना भाग्य बनाने को तत्पर हो जायेंगे । यह भगवान की शरण की महिमा है !
दुःशासन द्रौपदी की साड़ी खींच रहा था । द्रौपदी युधिष्ठिर की तरफ देखती है, अर्जुन की तरफ देखती है, भीम की तरफ देखती है । उनकी शरण लेते हुए आखिर भीष्म पितामह की शरण लेती है। कुछ नहीं हुआ । सब बड़े-बड़े महारथियों की तरफ देखती है, आक्रंद करती है, ‘बचाओ-बचाओ’ कहती है लेकिन सारे बचानेवाले किसी-न-किसी बाधा में, किसी-न-किसी बंधन में, किसी-न-किसी कल्पना और मान्यता के बंधन में बँधे हैं । आखिर जब द्रौपदी बाहर की शरण छोड़कर, ‘हे द्वारिकाधीश !’ कहती है तो द्रौपदी की साड़ी में परमात्मा साड़ी का अवतार ले लेते हैं । दुःशासन साड़ी खींचते-खींचते थक गया, पसीने से तर-बतर हो गया लेकिन वह अभागा सफल नहीं हुआ और बोलने लगा कि ‘यह नारी है कि साड़ी है ?’ न नारी है, न साड़ी है; किसीके लिए तेरा अंतर्यामी परमात्मा साड़ी-अवतार हो गया है ।
हम लोगों को चाहिए कि हम धन की शरण, झूठ-कपट की शरण, सत्ता की शरण, टोने-टोटके की शरण, राजनीति की शरण - ये छोटी-छोटी शरण न लें । भगवान सत्यस्वरूप हैं, हम सत्य की शरण जायें । भगवान आनंदस्वरूप हैं हम भगवान के आनंद की शरण जायें । भगवान प्राणिमात्र के सुहृद हैं तो हम सुहृदता के भाव को बढ़ायें न कि शोषण के भाव को । जो भगवान में गुण हैं उन गुणों का हम आदर करेंगे तो हम भगवान की शरण हो जायेंगे और जो असुरों के चोरी-जारी, कपट, निंदा, शोषण आदि दुर्गुण हैं, ऐसे दुर्गुणों का सेवन करेंगे तो भगवान की शरण का फायदा नहीं मिलेगा । भगवान की शरण जितने अंश में ठीक-से होती है, उतना ही जीवन में सहज, स्वाभाविक सामर्थ्य आता है ।
भगवद्-शरणागति के कई उपाय हैं । एक तो भगवान के आश्रय हो जाना चाहिए। जैसे हम पृथ्वी के आश्रय हैं । सोते हैं तो भी पृथ्वी के आश्रय हैं, चलते हैं, घूमते हैं, गाड़ी में बैठते हैं तो भी आसरा पृथ्वी का ही रहता है । तो जैसे शरीर पृथ्वी का आश्रय लेता है, ऐसे ही तुम्हारा मन भगवान का आश्रय लेकर ही जीता है, यह बात तुम समझ जाओ ।
दूसरा है अवलंबन । आश्रय भी भगवान का, अवलंबन भी भगवान का । जैसे किसीका एक्सीडेंट हो गया और उसकी भुजा टूट गयी । भुजा टूट गयी तो गले में पट्टी डालकर भुजा अवलंबन लेगी, लटकती रहेगी अर्थात् हाथ गले पड़ गया । ऐसे ही तुम भगवान के गले पड़ जाओ । ठाकुरजी के गले पड़ जाओ । जैसे बच्चा इधर-उधर कुछ करता है लेकिन देखता है कि मुसीबत है तो मॉं के गले पड़ जाता है, बाप के गले पड़ जाता है, दादा-दादी के गले पड़ जाता है । मध्य रात को सबको दौड़-भाग करवा देता है । बच्चे के पास कला होती है । तुम भी बच्चे होकर तो आये हो । वह कला तुममें छुपी है । तो तुम भगवान के गले पड़ना सीखो।
बोले - ‘मन नहीं लगता ।’ तो भगवान से कहो - ‘महाराज ! मन नहीं लगता है । हम तो जैसे-तैसे हैं, तेरे हैं । मन नहीं लगता । लगा दो ना... लगा दो ना...’ ऐसा करके रोओ । देखो, फिर रोने का भी मजा आयेगा और वह तुम्हारा रुदन सुन लेगा ।
तीसरा है अधीनता । जैसे बालक माँ के अधीन हो जाता है- माँ चाहे जहाँ बिठाये, जहाँ सुलाये, जहाँ खिलाये... , ऐसे ही तुम भगवान के अधीन हो जाओ कि जो हुआ, अच्छा हुआ । जरा-जरा बात में दुःख, जरा-जरा बात में भय, जरा-जरा बात में चिंता क्यों करना ? मेरा क्या होगा, बेटे का क्या होगा, बेटी का क्या होगा ?
काहू डोलत प्रानिया तिद राखेगो सर्जनहार ।
भगवद्-शरणागति योग बड़ा सलामत योग है । भगवद्-शरण जानेवाला पुरुष तमाम आपदाओं से सहज में ही बच जाता है । मनुष्यों के सारभूत जो परमात्मा हैं, वे तुम्हारा आत्मा होकर बैठे हैं । अगर उनकी शरण जाने का इरादा हो जाय तो तुम्हारे दुःख तो दूर हो जायेंगे, साथ ही तुम्हारा चित्त चैतन्य के आनंद और करुणा से भर जायेगा ।