Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

बल एवं पुष्टि वर्धक तिल

तिल स्निग्ध, उष्ण, उत्तम वायुशामक, कफ-पित्तवर्धक, पचने में भारी, बल-बुद्धि व जठराग्नि वर्धक, त्वचा, बाल तथा दाँतों के लिए हितकारी हैं । (अष्टांगहृदय, सुश्रुत संहिता)

तिल लाल, सफेद व काले - तीन प्रकार के होते हैं, जिनमें काले तिल गुणों में श्रेष्ठ हैं । तिल में प्रोटीन, लौह, मैग्नेशियम, ताँबा एवं विटामिन ए, बी-1, बी-6, ई तथा दूध से 3 गुना अधिक कैल्शियम पाया जाता है । यह कैंसररोधी है तथा उच्च रक्तचाप (hypertension)  से रक्षा करता है । तिल हड्डियों को मजबूत बनाता है । यह मोटे व्यक्तियों में चरबी को घटाता है एवं दुबले-पतले लोगों में चरबी बढ़ाता है अर्थात् शरीर को सुडौल बनाता है ।

* तिलों को पीसकर बनाये गये उबटन से स्नान करने से वायु का शमन होता है ।

तिल के पुष्टिकर व स्वादिष्ट व्यंजन

(1) तिलकुट :

लाभ : इसके सेवन से वीर्य तथा रस-रक्तादि की वृद्धि व वात का शमन होता है । जिन व्यक्तियों को, विशेषतः वृद्धजनों को शीतकाल में बार-बार पेशाब आता है, उनके लिए भी यह लाभदायी है ।

विधि : एक कटोरी तिलों को धीमी आँच पर 3-4 मिनट तक भून लें । ठंडा होने पर उन्हें मोटा पीस लें । उसमें आधा कटोरी पिसी मिश्री या गुड़ मिलायें । थोड़ा-सा इलायची का चूर्ण भी डाल सकते हैं ।

सेवन-विधि : 10 से 20 ग्राम तिलकुट सुबह चबा-चबाकर खायें ।

(2) तिल की चटनी : एक कटोरी सफेद अथवा काले तिलों को धीमी आँच पर 3-4 मिनट तक भून लें । ठंडा होने पर इनमें 20-25 सूखे कढ़ी पत्ते, 2-3 सूखी लाल मिर्च व स्वादानुसार सेंधा नमक मिलाकर मोटा पीस लें । इसका भोजन के साथ सेवन करने से पाचन-तंत्र मजबूत होता है ।

ध्यान दें : तिल का सेवन सर्दियों में करना हितकारी है । इन्हें रात में न खायें । पचने में भारी होने से तिल कम मात्रा में खायें । इनकी अधिक मात्रा आमाशय को शिथिल करती है । त्वचारोग, सूजन, अधिक मासिक स्राव व पित्त-विकारों में तथा गर्भिणी स्त्रियाँ तिल का सेवन न करें । उष्ण प्रकृति के व्यक्ति अल्प मात्रा में मिश्री के साथ सेवन करें । 

Ref: RP-336-December-2020