Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

प्राण धारण करने की विधि

पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘प्राणायाम का नियम फेफड़ों को शक्तिशाली रखता है एवं मानसिक तथा शारीरिक रोगों से बचाता है । प्राणायाम दीर्घ जीवन जीने की कुंजी है । प्राणायाम के साथ शुभ चिंतन किया जाय तो मानसिक एवं शारीरिक - दोनों प्रकार के रोगों से बचाव एवं छुटकारा मिलता है । शरीर के जिस अंग में दर्द एवं दुर्बलता तथा रोग हो, उसकी ओर अपना ध्यान रखते हुए प्राणायाम करना चाहिए । शुद्ध वायु नाक द्वारा अंदर भरते समय सोचना चाहिए कि प्रकृति से स्वास्थ्यवर्धक वायु वहाँ पहुँच रही है जहाँ मुझे दर्द है ।आधा से 1 मिनट श्वास रोके रखें व पीड़ित स्थान का चिंतन कर उस अंग में हलकी-सी हिलचाल करें । श्वास छोड़ते समय यह भावना करनी चाहिए कि पीड़ित अंग से गंदी हवा के रूप में रोग बाहर निकल रहा है एवं मैं रोगमुक्त हो रहा हूँ । ॐ... ॐ... ॐ...इस प्रकार नियमित अभ्यास करने से स्वास्थ्यप्राप्ति में बड़ी सहायता मिलती है ।

प्राण सब प्रकार के सामर्थ्य का अधिष्ठान होने से प्राणायाम सिद्ध होने पर अनंतशक्ति-भंडार के द्वार खुल जाते हैं । अगर कोई साधक प्राणतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर उस पर अपना अधिकार प्राप्त कर ले तो जगत में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो उसके अधिकार में न हो । वह अपनी इच्छानुसार सूर्य और चन्द्र को भी गेंद की तरह उनकी कक्षा में से विचलित कर सकता है । अणु से लेकर सूर्य तक जगत की तमाम चीजों को अपनी मर्जी-अनुसार संचालित कर सकता है । योगाभ्यास पूर्ण होने पर योगी समस्त विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है । यदि वह संकल्प चला दे तो उसके संकल्पबल से मृत प्राणी जिंदे हो जाते हैं । जिंदे उसकी आज्ञानुसार कार्य करने को बाध्य हो जाते हैं । देवता और पितृलोकवासी जीवात्मा उसके हुक्म को पाते ही हाथ जोड़कर उसके आगे खड़े हो जाते हैं । तमाम ऋद्धि-सिद्धियाँ उसकी दासी बन जाती हैं । प्रकृति की समग्र शक्तियों का वह स्वामी बन जाता है क्योंकि उस योगी ने प्राणायाम सिद्ध करके समष्टि प्राण को अपने काबू में किया है । जो प्रतिभावान युगप्रवर्तक महापुरुष मानव-समाज में अद्भुत शक्ति का संचार कर उसे ऊँची स्थिति पर ले जाते हैं, वे अपने प्राण में ऐसे उच्च और सूक्ष्म आंदोलन उत्पन्न कर सकते हैं कि दूसरों के मन पर उनका प्रगाढ़ प्रभाव हो । असंख्य मनुष्यों का हृदय उनकी ओर आकर्षित होता है । लाखों-करोड़ों लोग उनके उपदेश ग्रहण कर लेते हैं । विश्व में जो भी महापुरुष हो गये हैं उन्होंने किसी भी रीति से प्राणशक्ति को नियंत्रित करके अलौकिक शक्ति प्राप्त की होती है । किसी भी क्षेत्र में समर्थ व्यक्ति का प्रभाव प्राण के संयम से ही उत्पन्न हुआ है ।’’                   (क्रमशः)

Ref: RP-291-March-2017