Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

अनंत ब्रह्मज्ञान को पाने में सहायक पर्व : गुरुपूर्णिमा

29 जुलाई को गुरुपूर्णिमा का महापर्व है । सनातन संस्कृति का यह अति महत्त्वपूर्ण पर्व है । यह पर्व संत श्री आशारामजी आश्रम की देश-विदेश की सभी शाखाओं में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है । आश्रमों में प्रभातकाल से ही साधकों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है । इस दिन श्रद्धालुजन अपने ज्ञानदाता गुरुदेव पूज्य बापूजी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करके मानस पूजन करते हैं । सत्संग, कीर्तन, प्रसाद-वितरण आदि का दौर पूरा दिन चलता रहता है । 

इस पर्व की आवश्यकता व महत्ता के बारे में पूज्य बापूजी के सत्संग-वचनामृत में आता है :

जीव अनादि है, ईश्वर अनादि है, अविद्या अनादि है, अविद्या व चेतन का संबंध अनादि है, जीव-ईश्वर का भेद अनादि है लेकिन वे अनंत नहीं हैं, केवल ब्रह्म अनादि अनंत है । उस अनादि अनंत के ज्ञान का साक्षात्कार होने से बाकी ये सब सांत (अंतवाले) हो जाते हैं । इन 5 अनादि पदार्थों के प्रभाव का अंत हो जाता है परंतु शुद्ध ज्ञान का अंत नहीं होता । ऐसे शुद्ध ज्ञान को पाने की परम्परा सजी-धजी रहे इसीलिए देवताओं ने वरदान से गुरुपूर्णिमा को मंडित किया । इस पूर्णिमा से साधक पूरा लाभ उठाते हैं । 

जहाँ प्रकृति के, माया के प्रभाव का अंत हो जाता है, जीव के जीवत्व और ईश्वर से भयभीत होने का अंत हो जाता है फिर भी ईश्वर-तत्त्व के ज्ञान का अंत नहीं होता, ऐसे अनंत ब्रह्मज्ञान को पाने की व्यवस्था में सहायरूप होनेवाली पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा कहते हैं । 

‘गु’ माने अंधकार, ‘रु’ माने प्रकाश । जो जन्म-जन्मांतर के अज्ञान-अंधकार के संस्कारों को मिटा के जीवन में ‘स्व’ (आत्मस्वरूप) का प्रकाश, शाश्वत ज्ञान-प्रकाश कर दें उन्हें गुरु कहते हैं । जहाँ सूर्य का प्रकाश भी नन्हा हो जाता है, चन्द्रमा का प्रकाश पहुँच नहीं पाता है, बेचारे अग्नि और तारों का प्रकाश तो पहुँचेगा कैसे ? 

न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः ।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।। (गीता : 15.6) 

ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः । (श्वेताश्वतर उपनिषद् : अध्याय 6, मंत्र 13) 

उस आत्मज्ञान को, आत्मदेव को जानने से मनुष्य सब बंधनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है । ऐसे ज्ञान को पाने की प्रेरणा देनेवाला उत्सव है गुरुपूर्णिमा का उत्सव । मनुष्य सारे धर्म, कर्म और पुण्य कर ले परंतु इस ज्ञान के बिना सब अधूरा है । जड़भरतजी कहते हैं : 

‘रहूगण ! महापुरुषों के चरणों की धूलि से अपने को नहलाये बिना (अर्थात् उनके हृदय को छूकर जो अनुभव की वाणी निकलती है उसको शिरोधार्य किये बिना) केवल तप, यज्ञादि वैदिक कर्म, अन्नादि के दान, अतिथिसेवा, दीनसेवा आदि गृहस्थोचित धर्मानुष्ठान, वेदाध्ययन अथवा जल, अग्नि या सूर्य की उपासना आदि किसी भी साधन से परमात्म-ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता ।’ (श्रीमद्भागवत : स्कंद 5, अध्याय 12, श्लोक 12)

यह ज्ञान तो गुरुगम्य है । सच्चिदानंद परब्रह्म से आदिनारायण को, उनसे ऋषि-मुनियों को यह ज्ञान मिला, फिर उनके शिष्यों को यह ज्ञान मिला, उनसे उनके शिष्यों को... इस प्रकार होते-होते गुरु-परम्परा से ही यह शुद्ध-बुद्ध सनातन सत्यस्वरूप आत्मा-परमात्मा का ज्ञान पाना सम्भव है । 

...तब भी गुरुओं का आदर होता चला जायेगा

गुरुओं के नाम पर कोई अपयश या अपकीर्ति का झंडा लेकर फैलावा करते हों तब भी गुरुओं का आदर होता चला जायेगा । ज्ञान का जन्म नहीं होता, ज्ञान की मृत्यु नहीं होती तो आत्मज्ञान, आत्मशांति पाये हुए महापुरुष के प्रभाव की मृत्यु कैसे होगी ? चाहे संत नामदेवजी हों, संत नरसिंह मेहताजी हों, संत गोरा कुम्हार हों, संत कबीरजी हों, गुरु नानकजी हों, संत ज्ञानेश्वरजी हों, संत तुकारामजी हों, संत एकनाथजी हों, चाहे और कोई महापुरुष हों सभी महापुरुषों के साथ निंदकों ने घृणित कृत्य किये हैं, उन पर कीचड़ उछाला है । यहाँ तक कि भगवान श्रीरामजी के राज्य में वसिष्ठजी जैसे समर्थ सद्गुरु पर भी बकनेवालों ने कीचड़ उछाला । योगवासिष्ठ महारामायण में वसिष्ठजी कहते हैं : ‘अज्ञानी जो कुछ मुझको कहते हैं और हँसते हैं सो मैं सब जानता हूँ परंतु मेरा जो दया का स्वभाव है इससे मैं चाहता हूँ कि किसी प्रकार वे नरकरूप संसार से निकलें और इसी कारण मैं उपदेश करता हूँ ।

जो परमहंस संत मिलें और जो साधु हों तथा जिनमें एक गुण भी शुभ हो उसको अंगीकार कीजिये परंतु साधु के दोष न विचारिये । हे रामजी ! मैं हाथ जोड़ के प्रार्थना करता हूँ कि जो कुछ मैं तुमको उपदेश करता हूँ उसमें ऐसी आस्तिक भावना कीजियेगा कि इन वचनों से मेरा कल्याण होगा ।’ 

कैसे हैं ज्ञान के दाता, ज्ञान के उदधि ! जैसे पूर्ण चन्द्रमा को देखकर दरिया अपने में समाता नहीं, लहराता है ऐसे ही पूर्ण सत्शिष्यों को देख के सद्गुरुरूपी सागर भी समाता नहीं । सद्गुरुरूपी सागर न जाने कैसे-कैसे मोती फेंकता है, न जाने कैसे-कैसे वचन उछालता है और शिष्यों का हृदय गद्गद हो जाता है । 

गुरुपूर्णिमा पूर्ण होने की खबर लानेवाला उत्सव है । यह व्रत है । इस दिन गुरु-पूजन किये बिना शिष्य अन्न नहीं खाते । गुरुपूर्णिमा उत्सव मनानेवाले गुरुभक्तों को ज्ञान, भक्ति और पुण्य प्राप्त हो जाता है ।

ऐसे करें संकल्प व मानस पूजा

गुरुपूर्णिमा के एक दिन पहले रात्रि को सोते समय संकल्प करना कि ‘कल सुबह हम नींद से उठते ही गुरु के दिये हुए ज्ञान और गुरुस्वरूप परमात्मा का चिंतन करेंगे, उनकी मानसिक पूजा करेंगे ।’ फिर श्वासोच्छ्वास में अजपाजप करते-करते सो जाना । 

प्रभात को नींद खुले तो बिस्तर पर ही बैठकर निश्चय करना कि ‘आज जीव को शिव (ईश्वर) बनानेवाली, लघु को गुरु बनानेवाली, चौरासी के चक्कर में भटकनेवाले जीवात्मा को परमात्म-पद में पहुँचानेवाली पूनम है । आज बड़े भाव से गुरुदेव का मानसिक पूजन करूँगा ।’ 

थोड़ी देर मन-ही-मन गुरु की मानसिक मुलाकात कर ली, बातचीत कर ली । अमृतवेला होती है तब आपके शुभ संकल्पों के तरंग बहुत काम करते हैं । फिर नहा-धो के प्राणायाम आदि करके नियम के समय मानसिक पूजा कर लेना । इस पर्व पर मानस पूजा, मौन, उपवास, सत्संग-दर्शन का विशेष लाभ होता है । 

हमको गुरुदेव ने जहाँ रहने को कहा था वहाँ से गुरुदेव का निवास-स्थान सैकड़ों किलोमीटर दूर था तो हम गुरुदेव को मानसिक स्नान करा देते, शरीर को पोंछते, वस्त्र पहनाते, केसर-चंदनवाला तिलक लगाते, पुष्पों की माला पहनाते, मोतियों का हार पहनाते । फिर गुरुदेव को देखते रहते, ‘हमारे गुरु ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं, महेशस्वरूप हैं, चैतन्य हैं । दिखते इतने शरीर भर हैं लेकिन विभु हैं । सारा संसार गुरुमय, ईश्वरमय, चैतन्यमय है । सबकी गहराई में मेरे गुरुदेव ही हैं । ॐ श्री गुरुभ्यो नमः ।’ इस प्रकार की पूजा से तो गुरु रोकेंगे नहीं । इससे आप गुरु के स्वरूप में पहुँच जायेंगे, गुरु-तत्त्व को पा लेंगे ।

पूजन करके गुरुदेव से बातें करते : ‘साँईं ! कैसा हाल है ? अच्छा है न ? वाह ! साँईं वाह !!...’ 

गुरुपूनम पर्व पर ऐसा करते और बाकी दिनों में तो ऐसे ही चलते-फिरते उनके साथ अपन लगे रहते । तो बाकी के अपनी जगह पर रहे और हमको गुरुदेव ने अपनी जगह पर पहुँचा दिया ।

Ref: Issue390-June-2025