28 अगस्त को रक्षाबंधन है । इस उत्सव की महत्ता व आवश्यकता के बारे में पूज्य बापूजी के सत्संग में आता है :
रक्षाबंधन महोत्सव है, इसे श्रावणी पूनम, राखी पूनम, नारियली पूनम भी कहते हैं । ऋषियों ने बहुत सूक्ष्मता से विचारा होगा कि मानवीय सम्भावनाएँ कितनी ऊँची हो सकती हैं और असावधानी रहे तो मानवीय पतन कितना नीचा और गहरा हो सकता है ।
रक्षाबंधन महोत्सव खोजनेवाले उन ऋषियों को, वेद भगवान का अमृत पीनेवाले, वैदिक रस का प्रचार-प्रसार करनेवाले और समाज में वैदिक अमृत की सहज, सुलभ गंगा बहानेवाले ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को मैं प्रणाम करता हूँ, आप भी उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करो ।
है तो एक राखी का धागा परंतु बड़ी-बड़ी विकट परिस्थितियों से रक्षा करता है । पड़ोस की बहन ने देखा कि पड़ोस का भाई देखता है लेकिन दृष्टि कुछ ऐसी-वैसी है, उठाया एक धागा और भाई करके उसे राखी बाँध दी । पड़ोस की बहन के चित्त में पड़ोस के भाई के लिए शुभकामना उठी अथवा भाई ने ही बहन को राखी दी । युवक-युवती काम के शिकार न बनें, संयमी जीवन जियें इसलिए भी राखी पूनम का सदुपयोग बहुत भारी हो सकता है ।
रक्षाबंधन के दिन बहन ने भाई के हाथ में राखी बाँधी, ललाट पर तिलक किया, ‘मेरा भाई भगवान शिव की नाईं ज्ञानसंयुक्त जिये, त्रिलोचन बने ।’ साथ में बहन भैया के मुख में कुछ मिष्टान्न डाल देती है । बहन के इस प्रेम से, शुभ संकल्प के तिलक, राखी के धागे तथा मिष्टान्न से भैया के भाव मधुर होते हैं और बहन की सुरक्षा का संकल्प भी उसके चित्त में उठता है ।
जिस बहन ने राखी बाँधी वह बहन तो सुरक्षा की अधिकारी है ही है परंतु पड़ोस की बहन भी हमारी बहन है, उसकी सुरक्षा करने का मौका मिले तो चूकना नहीं चाहिए ।
रक्षाबंधन पर्व के दिनों में घर की दीवाल पर श्रवण कुमार का चित्र अंकित करना चाहिए कि ‘कैसा रहा होगा श्रवण कुमार, जिसने अपने अंधे माता-पिता को कावड़ में लेकर यात्रा करवायी ।’ इससे माता-पिता की सेवा करने की सत्प्रेरणा मिलेगी और माता-पिता सेवा से संतुष्ट होकर हमारे लिए जो शुभ संकल्प करेंगे उससे काम-विकार की खाइयों से रक्षा हो जायेगी ।
रक्षाबंधन महोत्सव के निमित्त गुरु के द्वार जाते हैं तो गुरुदेव के चित्त में हमारे लिए शुभ संकल्प उठते हैं । हमारे लिए शुभ संकल्प गुरु के चित्त में उठें तो कई विकारी खाइयों से हमारी रक्षा होती है ।
यह व्रत पूर्णिमा है । जिसके जीवन में कोई व्रत नहीं है उसके जीवन का कोई ठोस विकास भी नहीं है । व्रत विकास के लिए अद्भुत साधन है । जैसे मौनव्रत, एकादशी, पूर्णिमा, तीज का, जन्माष्टमी का व्रत... व्रत और मनौती तन, मन व जीवन में दृढ़ता लाते हैं ।
धन, परिवार और शरीर से अपनापन मानने से जीव को बंधन होता है । आज व्रत ले लो कि ‘धन मेरा है यह ऊपर-ऊपर से भले व्यवहार में कहूँगा परंतु वास्तव में धन, परिवार, शरीर मेरा नहीं, पंचभूतों का है, प्रकृति का है । मेरा तो परमात्मा है और मैं परमात्मा का हूँ ।’ इस प्रकार का व्रत लेंगे तो निर्भयता आयेगी ।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा... त्याग से जियो । किसी चीज-वस्तु को मेरी-मेरी करोगे तो भय आयेगा । मेरी नहीं है, सर्जनहार की है और यहीं पड़ी रहेगी । तो अंतःकरण में त्याग की वृत्ति बढ़ेगी ।
ब्राह्मण हों, चाहे विद्यार्थी हों, चाहे पड़ोस के भाई-बहन हों, चाहे साधक और संत हों... यह नारियली पूनम, राखी पूर्णिमा प्रेम, त्याग और सदाचार का संदेश देकर परस्पर मंगल संकल्प करने का अवसर देती है ।
REF: ISSUE391-JULY-2025