गुरुपूर्णिमा की बधाई हो, व्यासपूर्णिमा की बधाई हो ! गुरुपूनम गजब का महोत्सव है । यह तपस्या का दिन है । सुंदर-में-सुंदर सुखद स्वरूप को पाने का अवसर है ।
जन्माष्टमी, दिवाली, उत्तरायण, चेटीचंड... ये उत्सव मनुष्य मनाते हैं परंतु गुरुपूनम तो मनुष्य, देवता, दैत्य - सभी मनाते हैं । देवता अपने गुरु बृहस्पतिजी के चरणों में जाते हैं, दैत्य अपने गुरु शुक्राचार्य के पास जाते हैं, श्रीराम गुरु वसिष्ठजी के यहाँ और भगवान श्रीकृष्ण अपने गुरु सांदीपनिजी के चरणों में जाते हैं । तो गुरुपूनम बड़ा महत्त्वपूर्ण उत्सव है । और सब चीजें लघु हैं गुरु-तत्त्व से । परमात्मा का एक नाम ‘गुरु’ है । ‘गुरु’ शब्द का अर्थ होता है - ‘गु’ माने अंधकार, ‘रु’ माने प्रकाश । जीवात्मा अज्ञान-अंधकार से जुड़कर अपने ज्ञान-प्रकाश को नहीं जानता है, उसको जताने की व्यवस्था करनेवाले महापुरुषों को कह दिया ‘सद्गुरु’ । मौत के समय धन-सम्पत्ति तो क्या, अपने शरीर का एक बाल, एक रोम भी तुम नहीं ले जा सकते हो इसलिए गुरुपूनम तुम्हें गुरु-तत्त्व का साक्षात्कार करने, गुरुदेव के अनुभव को अपना अनुभव बनाने की प्रेरणा देती है ।
ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की महती कृपा
यह व्यासपूर्णिमा महर्षि वेदव्यासजी के नाम से जानी जाती है । गुरु-परम्परा में छठे हैं वेदव्यासजी । उन्होंने क्या-क्या किया... वेदों का वर्गीकरण किया, ब्रह्मसूत्र, महाभारत, स्मृतियों एवं 18 पुराणों की रचना की, दृष्टि डालकर विधवा भाभियों को संतानें दे दीं । जिस भाभी ने आँखें बंद कर लीं उससे अंधा धृतराष्ट्र पैदा हुआ । जो देखते-देखते सिकुड़ गयी - शर्म से पीली हो गयी उससे पांडु पैदा हुए । जिससे धृतराष्ट्र पैदा हुआ उस भाभी को और एक संतान की प्राप्ति के लिए दुबारा माँ ने भेजना चाहा तो उसने अपने बदले दासी को भेजा, उससे पैदा हुई संतान दासीपुत्र विदुर कहलाये । विदुरजी के उपदेश नीति ग्रंथ ‘विदुर नीति’ के नाम से आज भी प्रसिद्ध हैं ।
वेदव्यासजी में ऐसी शक्तियाँ हैं, ऐसी दिव्यता है कि उनके तुल्य आज तक शायद ही कोई महापुरुष धरती पर आये हों जो वेदराशि को चार ग्रंथों में वर्गीकृत कर दें । वेदों का वर्गीकरण करना बच्चों का खेल नहीं है, नेताओं का खेल नहीं है, यह तो अवतारी महापुरुषों की ही कृपा है । सुख के लिए भटकनेवाले जीव पर वेदव्यासजी ने बड़ी कृपा की, चार वेदों के चार महावाक्य उनके साररूप में सुनिश्चित किये :
ऋग्वेद, ऐतरेयोपनिषद् (खंड 1, अध्याय 3, मंत्र 3) में प्रज्ञानं ब्रह्म । ‘यह प्रज्ञान1 ही ब्रह्म है ।’
यजुर्वेद, बृहदारण्यकोपनिषद् (अध्याय 1, ब्राह्मण 4, मंत्र 10) में अहं ब्रह्मास्मि । ‘मैं ब्रह्म हूँ ।’
सामवेद, छांदोग्योपनिषद् (अध्याय 6, खंड 8, मंत्र 7) में तत्त्वमसि । तत् माने ‘वह’, त्वम् माने ‘तू’, असि माने ‘है’ । तू जिसको खोजता है न, मूल में तू वही है ।
अथर्ववेद, मांडूक्योपनिषद् (मंत्र 2) में अयमात्मा ब्रह्म । ‘यह आत्मा ब्रह्म है ।’ अर्थात् तुम जीवात्मा ब्रह्म हो ।
यह उपनिषदों की बात श्रीकृष्ण ने भी कही :
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । (गीता : 15.7)
‘तू मेरा सनातन अंश (अविभाज्य स्वरूप) है ।’ भगवान भी बोलते हैं सनातन, वेद भगवान भी बोलते हैं सनातन परंतु सनातन होते हुए भी बार-बार नष्ट हो रहे हैं, मर रहे हैं, जन्म रहे हैं... इस जन्मने-मरने की कोई गिनती नहीं । श्रीकृष्ण थे, श्रीराम थे, अन्य कई अवतार हुए तब भी तुम न जाने कहाँ रेंग रहे थे, कहाँ 4 पैर से भाग रहे थे, 2 पैर से भाग रहे थे, बिना पैरवाले जंतु बने, पेड़ बने, तुमने कितने जन्म लिये !
वसिष्ठजी महाराज कहते हैं : ‘‘हे रामजी ! मेरु के शिखर से लेकर चरणोंपर्यंत गंगा का प्रवाह चले तो उसके बालू के कण चाहे गिने जा सकें परंतु संसक्त (सांसारिक विषय-वासना में लगे हुए) जीव के शरीरों की संख्या नहीं गिनी जा सकती ।’’
अब तो अपने-आप पर कृपा करो । इसी जन्म में ऐसी चाह करो कि ‘परमात्म-प्राप्ति की चाह में सब तुच्छ चाहें बह जायें’ और परमात्म-प्राप्ति की चाह झूठमूठ में भी करो तो भी अंतर्यामी परमात्मा कृपालु है, देखेगा कि ‘झूठमूठ में भी मेरी ही चाह कर रहा है’ तो दया कर देगा ।
‘प्रभु ! मेरे में आपको पाने की चाह भी नहीं है और मैं आपको जानता भी नहीं हूँ परंतु आप मेरे को जानते हो, मैं जैसा-तैसा हूँ आपका हूँ ।’ ऐसा तो कर ही सकते हो । जब वह रीझेगा न, तुमसे मिलना चाहेगा तो ऐसा मार्गदर्शन करेगा और ऐसा गुरु का वचन तुम्हारे हृदय में प्रवेश करा के आर-पार कर देगा कि तुम सोच भी नहीं सकते । मेरे गुरुजी ने छूमंतर थोड़े ही किया, आसोज सुद दो दिवस2 को तड़ाका-भड़ाका थोड़े ही किया; सेवक को पंचदशी ग्रंथ दे दिया, वह पढ़ने बैठा, मुझे संकेत किया कि ‘सुन !’
मैंने सुना । गुरुजी को पता था, ‘इसको तड़प है, तेल-बाती सब तैयार है ।’ गुरुजी का अपना संकल्प, उनका जला हुआ दीया था, उसका बाती से स्पर्श हो गया तो दीये से दीया प्रकाशित हो गया... दोनों का प्रकाश एक हो गया । अब कौन-से दीये की कौन-सी रोशनी यह कौन बता पायेगा ? ऐसा ही हो गया ।
ऐसे महापुरुष धरती पर नहीं होते तो आध्यात्मिकता मर-मिटती । कभी आद्य शंकराचार्यजी, कभी स्वामी रामानंदजी, कभी संत कबीरजी, कभी संत दादू दयालजी, कभी संत ज्ञानेश्वरजी, कभी गुरु नानकजी, कभी रामकृष्ण परमहंसजी, कभी रमण महर्षिजी, कभी साँईं लीलाशाहजी बापू तो कभी कोई... ऐसे महापुरुषों की परम्परा से आध्यात्मिकता का सत्त्व हिन्दुस्तान में अब भी है ।
ऐसे महामानवों के पूजन का, मानव-जाति के प्रति किये गये उनके अनंत-अनंत उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा, व्यासपूर्णिमा । गुरुपूर्णिमा कई देशों में मनायी जाती थी परंतु वहाँ ऐसे महापुरुष अभी हैं नहीं तो वहाँ महापुरुषों की परम्परा रही नहीं, नेपाल, म्यांमार (बर्मा) आदि में मनाते हैं और अभी अपने साधक तो दुनिया के कई देशों में मनाते हैं, और भी सम्प्रदायों के साधक, भक्त कई देशों में मनाते हैं ।
---------------------
1. प्रज्ञान अर्थात् ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुटी से रहित ज्ञान या ज्ञानमात्र आत्मा
2. ‘आसोज सुद दो दिवस’ अर्थात् आश्विन शुक्ल द्वितीया । इसी तिथि को पूज्य बापूजी को साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज की कृपा से आत्मसाक्षात्कार हुआ था ।