एक बार ऋषि दयानंद से किसीने पूछा : ‘‘आपको कामदेव सताता है या नहीं ?’’
उन्होंने उत्तर दिया : ‘‘हाँ, वह आता है परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता ।’’
ऋषि दयानंद संयम, साधन, भक्ति, ज्ञान बढ़ानेवाले कार्यों में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें सामान्य बातों के लिए फुर्सत ही नहीं थी । यही उनके ब्रह्मचर्य का रहस्य था ।
हे युवानो ! अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थता में न गँवाओ । स्वयं को किसी-न-किसी ऊँची सत्प्रवृत्ति में संलग्न रखो । व्यस्त रहने की आदत डालो । ‘खाली दिमाग, शैतान का घर ।’ निठल्ले व्यक्ति को ही विकार अधिक सताते हैं । आप अपने विचारों को पवित्र, सात्त्विक व उच्च बनाओ । विचारों की उच्चता बढ़ाकर आप अपनी आंतरिक दशा को परिवर्तित कर सकते हो । उच्च व सात्त्विक विचारों के रहते हुए राजसी एवं हलके विचारों और कर्मों की दाल नहीं गलेगी । सात्त्विक व पवित्र विचार ही ब्रह्मचर्य का आधार हैं ।