5 नवम्बर को रमा एकादशी है । पद्म पुराण के उत्तर खंड में कथा आती है :
युधिष्ठिर ने पूछा : ‘‘जनार्दन ! मुझ पर आपका स्नेह है अतः कृपा करके बताइये कि कार्तिक के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है ?’’
भगवान श्रीकृष्ण बोले : ‘‘राजन् ! कार्तिक (अमावस्यांत आश्विन) मास के कृष्ण पक्ष में ‘रमा’ नाम की विख्यात और परम कल्याणमयी एकादशी होती है । यह परम उत्तम है और बड़े-बड़े पापों को हरनेवाली है ।
पूर्वकाल में मुचुकुंद नाम से विख्यात एक राजा हो चुके हैं, जो भगवान श्रीविष्णु के भक्त और सत्यप्रतिज्ञ थे । अपने राज्य पर निष्कंटक शासन करनेवाले उन राजा के यहाँ नदियों में श्रेष्ठ ‘चन्द्रभागा’ कन्या के रूप में उत्पन्न हुई । राजा ने चन्द्रसेन कुमार शोभन के साथ उसका विवाह कर दिया । एक बार शोभन दशमी के दिन अपने ससुर के घर आये और उसी दिन पूरे नगर में पूर्ववत् ढिंढोरा पिटवाया गया कि ‘एकादशी के दिन कोई भी भोजन न करे ।’ इसे सुनकर शोभन ने अपनी प्यारी पत्नी चन्द्रभागा से कहा : ‘‘प्रिये ! मुझे इस समय क्या करना चाहिए, इसकी शिक्षा दो ।’’
चन्द्रभागा बोली : ‘‘प्रभो ! मेरे पिता के घर एकादशी के दिन मनुष्य तो क्या, हाथी, घोड़े तथा अन्यान्य पशु भी भोजन नहीं कर सकते । प्राणनाथ ! यदि आप भोजन करेंगे तो आपकी बड़ी निंदा होगी । इस प्रकार मन में विचार करके अपने चित्त को दृढ़ कीजिये ।’’
शोभन ने कहा : ‘‘प्रिये ! तुम्हारा कहना सत्य है । मैं भी उपवास करूँगा । दैव का जैसा विधान है वैसा ही होगा ।’’
इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके शोभन ने व्रत के नियम का पालन किया किंतु सूर्योदय होते-होते उनका प्राणांत हो गया । राजा मुचुकुंद ने शोभन का राजोचित दाह-संस्कार कराया । चन्द्रभागा पति का पारलौकिक कर्म करके पिता के ही घर पर रहने लगी ।
नृपश्रेष्ठ ! उधर शोभन इस व्रत के प्रभाव से मंदराचल के शिखर पर बसे हुए परम रमणीय देवपुर को प्राप्त हुए । वहाँ शोभन द्वितीय कुबेर की भाँति शोभा पाने लगे ।
एक बार राजा मुचुकुंद के नगरवासी सोमशर्मा नाम से विख्यात ब्राह्मण तीर्थयात्रा के प्रसंग से घूमते हुए मंदराचल पर्वत पर गये । वहाँ उन्हें शोभन दिखाई दिये । राजा के दामाद को पहचानकर वे उनके समीप गये । शोभन भी उस समय द्विजश्रेष्ठ सोमशर्मा को आया हुआ देखकर शीघ्र ही आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम किया । फिर क्रमशः अपने ससुर राजा मुचुकुंद, प्रिय पत्नी चन्द्रभागा तथा समस्त नगर का कुशलक्षेम पूछा ।
सोमशर्मा ने कहा : ‘‘राजन् ! वहाँ सब कुशल-से हैं । आश्चर्य है कि ऐसा सुंदर और विचित्र नगर तो किसीने भी कहीं नहीं देखा होगा ! बताओ तो सही, आपको इस नगर की प्राप्ति कैसे हुई ?’’
शोभन बोले : ‘‘द्विजेन्द्र ! कार्तिक के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे ऐसे नगर की प्राप्ति हुई है । ब्रह्मन् ! मैं ऐसा मानता हूँ कि मैंने श्रद्धाहीन होकर इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया था इसलिए यह नगर स्थायी नहीं है । आप महाराज मुचुकुंद की सुंदरी कन्या चन्द्रभागा से यह सारा वृत्तांत कहियेगा ।’’
शोभन की बात सुनकर ब्राह्मण मुचुकुंदपुर में गये और वहाँ चन्द्रभागा के समक्ष सारा वृत्तांत कह सुनाया ।
सोमशर्मा बोले : ‘‘शुभे ! मैंने तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा तथा इन्द्रपुरी के समान उनके दुर्द्धर्ष नगर का भी अवलोकन किया । वे उसे अस्थिर बतलाते हैं । तुम उसको स्थिर बनाओ ।’’
चन्द्रभागा ने कहा : ‘‘ब्रह्मर्षे ! मेरे मन में पति के दर्शन की लालसा लगी हुई है । आप मुझे वहाँ ले चलिये । मैं अपने व्रत के पुण्य से उस नगर को स्थिर बनाऊँगी ।’’
भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं : ‘‘राजन् ! चन्द्रभागा की बात सुनकर सोमशर्मा उसे साथ ले मंदराचल पर्वत के निकट वामदेव मुनि के आश्रम पर गये । वहाँ ऋषि के मंत्र की शक्ति तथा एकादशी व्रत के प्रभाव से चन्द्रभागा का शरीर दिव्य हो गया तथा उसने दिव्य गति प्राप्त कर ली । इसके बाद वह पति के समीप गयी । अपनी प्रिय पत्नी को आयी देख शोभन को बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उसे बुलाकर अपने वाम भाग में सिंहासन पर बिठाया । तदनंतर चन्द्रभागा ने अपने प्रियतम से यह प्रिय वचन कहा : ‘‘नाथ ! मैं हित की बात कहती हूँ, सुनिये । जब मैं 8 वर्ष से अधिक उम्र की हो गयी तब से लेकर आज तक मेरे द्वारा किये हुए एकादशी व्रत से जो पुण्य संचित हुआ है उसके प्रभाव से यह नगर कल्प के अंत तक स्थिर रहेगा तथा सब प्रकार के मनोवांछित वैभव से समृद्ध रहेगा ।’’
नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से चन्द्रभागा दिव्य भोग, दिव्य रूप और दिव्य आभूषणों से विभूषित हो अपने पति के साथ मंदराचल के शिखर पर विहार करती है । राजन् ! रमा एकादशी चिंतामणि तथा कामधेनु के समान सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाली है । जो मनुष्य एकादशी व्रतों का माहात्म्य सुनता है वह सब पापों से मुक्त हो श्री विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ।’’