Rishi Prasad- A Spiritual Monthly Publication of Sant Sri Asharam Ji Ashram

...तब परमात्मा का साक्षात्कार होता है

आत्मज्ञान इस जीव का द्वैत भाव मिटा के अद्वैत ज्ञान का प्रकाश कर देता है । जो आत्मज्ञानरहित हैं वे चाहे कुछ भी पा लें, उनके दुःखों का अंत नहीं होगा । सुख उनके पास टिकेंगे नहीं और दुःख मिटेंगे नहीं । सुख को टिकाना है तो अमिट चीज अपने आत्मा को तुम्हें जानना ही पड़ेगा । 

नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय । (श्वेताश्वतर उपनिषद् : 3.8)

दुःखों से मुक्त होने का दूसरा कोई रास्ता नहीं है ।

कभी न छूटे पिंड दुःखों से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं ।

सद्गुरु की कृपा बिना असम्भव

वास्तव में तुम सत् हो परंतु तुम जानते नहीं । श्रीकृष्ण जानते हैं, शिवजी जानते हैं, लीलाशाहजी प्रभु जानते हैं, आशाराम जानते हैं । लो खोल दिया हृदय का भेद । कब ?

आसोज सुद दो दिवस, संवत् बीस इक्कीस ।

मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस ।।

मिला जीव से ईस ऐसा नहीं है । मिला ईस से ईस, मिला सत् से सत् । नहीं जानते थे, जीने की वासना थी, शरीर के मरने का भय था परंतु साधन-भजन किया और अनुष्ठान किया, प्रेरणा मिली, गये तो आसोज सुद दो दिवस पर क्या हुआ ? जैसे बाती बनायी रूई या कपड़े की, तेल में भिगोयी, लगायी बड़े दीये में परंतु वह दीया जले हुए दीये के सान्निध्य से ही जलेगा ऐसे ही जिनको सत्य का साक्षात्कार हुआ है वे सद्गुरु अथवा भगवान सद्गुरु का काम करके साक्षात्कार करायें तब साक्षात्कार होगा । 

अर्जुन के अत्यंत प्यारे श्रीकृष्ण, कृष्ण के अत्यंत प्यारे अर्जुन फिर भी उस सत्य का साक्षात्कार जब तक नहीं हुआ तब तक अर्जुन का भय, शोक, मोह नहीं गया, श्रीकृष्ण के तो दर्शन हुए थे । एकदम खुला सत्य है । 

पहले श्रीकृष्ण सखा होकर उपदेश दे रहे थे । जब अर्जुन ने शिष्यत्व स्वीकार करते हुए कहा : शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।। ‘मैं आदरसहित आपकी शरण आया हूँ, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे उपदेश दीजिये’ तब श्रीकृष्ण ने गुरुपद सँभाला और अर्जुन को साक्षात्कार हुआ । 

मेरे गुरुदेव ने जब कृपा की तो मुझे धीरे से कहा कि ‘‘यह शिष्य को या तो पुत्र को ही मिलता है ऋषि परम्परा से ।’’ 

शिष्य भी पुत्र है, पुत्र भी शिष्य ही है । अब मेरे थाऊमल पिताजी आ जायें तो आ गये ठीक है परंतु गुरुदेव आ जायें तो अभी-अभी मैं कूदकर उनके चरणों में नतमस्तक हो जाऊँ क्योंकि उन्होंने जो दिया है उसकी बराबरी करोड़ों-करोड़ों पिता-माता ने जो दिया उससे भी नहीं हो सकती । अनादि काल से सृष्टि चली आ रही है, करोड़ों पिता-माता तुम्हारे-हमारे हो गये । 

साक्षात्कार हेतु कैसी मति चाहिए ?

ईश्वर का ज्ञान होने के लिए हृदय में श्रद्धा चाहिए परंतु बुद्धि की सूक्ष्मतम अवस्था आती है तभी ईश्वर के शुद्ध रूप का ज्ञान होता है । भावना से भगवद्-दर्शन होते रहते हैं परंतु भावना मन में होती है और मन तो चित्त का स्पंदन है । चित्त के निर्णय को बुद्धि बोलते हैं और बुद्धि को साधन, संयम, सत्संग के द्वारा ऋतम्भरा प्रज्ञा बनाना पड़ता है । ‘ऋत’ माने ‘सत्य’ को समझने की क्षमता सद्गुरु की कृपा से और अपने सत्-साधन से होती है तब होती है ब्राह्मी स्थिति । यह आध्यात्मिक जगत में सर्वोपरि स्थिति है । बीरबल की मति ‘प्रत्युत्पन्न मति’ थी परंतु यह मति सर्वोपरि होती तो वे अकबर के गुलाम हो के नहीं रहते । जिसको आत्मसाक्षात्कार हुआ है वह अकबर तो क्या प्रधानमंत्री अथवा इन्द्र के आगे भी सिर नहीं झुकाता । ऐसे होते हैं आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष । उनका पद बहुत ऊँचा होता है । वसिष्ठजी दशरथ के गुलाम हो के थोड़े ही रहे, रामजी के गुलाम हो के रहे क्या ? वसिष्ठजी की ऋतम्भरा प्रज्ञा थी । ऋत माने सत्य । सत्य क्या होता है ?

यस्य सत्ता त्रिकालं अव्यभिचरति तत् सत्यम् ।

‘जिसकी सत्ता तीनों कालों में अबदल, ज्यों-की-त्यों रहती है वह सत्य है ।’ ऐसा शास्त्र कहते हैं ।

साक्षात्कार की महत्ता

राजा भोज की सभा में चर्चा हुई कि अमृत कहाँ रहता है ? किसीने कहा स्वर्ग में, किसीने कहा सागर में, किसीने कहा सुंदरियों के होंठों में तो किसीने कहा मणिधरों के पास । 

कवि कालिदास बोले : 

कण्ठे सुधा वसति वै भगवज्जनानाम् । 

जिनको भगवत्-साक्षात्कार हुआ है उनके कंठ में ही ब्रह्मविद्या का, ब्रह्म-अनुभूति का वास्तविक अमृत होता है । क्या समझते हो ? पूज्यपाद लीलाशाहजी बापू के कंठ में नहीं होता और उनकी दृष्टि से नहीं बरसता तो मेरे को थोड़े ही मिलता ! स्वर्ग का अमृत तो मैं कई बार इन्द्र हो के पी के झक मार के आया हूँ, कई बार ऋषियों के रूप में घूम के आया । यह 17वीं बार आया हूँ । लो : 

दास कबीर जतन सों ओढ़ी,

ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया ।।

नहीं तो तीसरी पढ़ा हुआ और इतना हो रहा है ! तत्त्वज्ञान की सिद्धि, आत्मसाक्षात्कार की सिद्धि सबसे ऊँची सिद्धि है । जिनको आत्मसाक्षात्कार की सिद्धि हो गयी उनके पास योगसिद्धि हो चाहे न हो, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन योगसिद्धिवाले के पास आत्मसाक्षात्कार की सिद्धि नहीं है तो वह अधूरा है ।

ईश्वरप्राप्ति का सुगम मार्ग

लोगों को खुश रखते हुए तुम परमात्मा का दर्शन कभी नहीं कर सकते । लोगों को नाराज करके तुम परमात्मा का दर्शन कभी नहीं कर सकते । तुम परमात्मा के लिए ऐसी छलाँग मारो कि लोग राजी होते हैं कि नाराज होते हैं - यह तुमको देखने का समय ही न मिले तब परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।

भगवान को पाने की रुचि के लिए भगवान को प्यार करो, भगवान को प्रार्थना करो और भगवान के नाम का जप करो । ईश्वर के विषय में बार-बार सुनो, ईश्वर का नाम बार-बार लो तो ईश्वर को पाने की रुचि तीव्र हो जायेगी । और ईश्वर मिलेगा तो नकली मैं का भ्रम काफूर हो जायेगा ।